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सूखे पत्तों के ढेर में

उम्मीद का

एक अंकुर फूटा

 

सूखे पत्ते मानो,

लाशें हैं

लाश हारे हुये लोगों की

लाश,

पराधीनता को किस्मत समझ

डर-डर के जीने वालों की

 

वो अंकुर है

भाग्योदय का

कीचड़ में उतर

परजीवियों को

साफ कर

समाज से

बीमारी हटाने वालों का

जो एक ज़र्रा था कल तक

आज

ज़माना उसकी चमक देख रहा है

 

अपनी नन्हीं आँखें खोल

मानो, कह रहा है

उठो

खुद को पहचानो,

खुद को बदलो,

आओ, नये युग की शुरुआत लिखें

 

 -मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 1, 2014 at 7:56pm

आदरणीय लड़ीवाला सर रचना को सराहने के लिये आपका आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 1, 2014 at 7:55pm

आदरणीया डॉ. प्राची जी रचना की सराहना के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 1, 2014 at 7:54pm

आदरणीय अखिलेश सर आपका आभार 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 1, 2014 at 5:57pm

आओ नव युग की शुरुआत करे - सुन्दर रचना के लिए बधाई और साथ ही वर्ष २०१४ का हर दिन आपके लिए शुभ हो यही मंगल कामनाए है 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 1, 2014 at 5:46pm

जो एक ज़र्रा था कल तक

आज

ज़माना उसकी चमक देख रहा है

अपनी नन्हीं आँखें खोल

मानो, कह रहा है

उठो

खुद को पहचानो,

खुद को बदलो,

आओ, नये युग की शुरुआत लिखें....वाह !

बहुत खूबसूरत कविता आ० शिज्जू जी .बहुत बहुत बधाई 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 1, 2014 at 12:56pm

आदरणीय  शिज्जू भाई, नव वर्ष की शुभ कामनाओं के साथ आपको इस सुंदर गीत की भी हार्दिक बधाई॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 1, 2014 at 10:32am

आदरणीय विजय सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by vijay nikore on January 1, 2014 at 10:27am

अति सुन्दर भाव। बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 31, 2013 at 11:25pm

आपका बहुत बहुत शुक्रिया नादिर भाई

Comment by नादिर ख़ान on December 31, 2013 at 10:54pm

नन्हीं आँखें खोल

मानो, कह रहा है

उठो

खुद को पहचानो,

खुद को बदलो,

आओ, नये युग की शुरुआत लिखें

वाह शिज्जु जी क्या बात है, आपकी रचनाओं का जवाब नहीं बहुत खूब ......

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