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खुद को सौंपा अब मैंने 'उनको '..


ओस की बूँद सी आँखों में सिमट आयी है...

फिर भी  क्यों लब पे हंसी छाई है..

सांझ का धुंधलका मेरे आसपास सिमटा है..

जैसे मेरे ज़ेहन की परछाई है..

 

क्यों मिले थे तुम ? क्यों पास हम आये थे?

क्यों अनजान बन के ख्वाब सजाये थे?

एक पत्थर से वो ख़्वाबों का घर बिखरा है..

जो हम अनजाने थे तो पहचाने से क्यों थे ?

खोयी नींदें अब फिर से लौटी हैं इन आँखों में..

बहुत ढूँढा कोई 'अपना' मैंने लाखों में..

'अपने' मुझे बस एक 'चीज' समझ लेते हैं ..

बेगाने रहें तो बस है इन 'अपने लाखों में '

 

ज़िन्दगी..बस ये ज़िन्दगी है मेरी ,अच्छी या बुरी..

कडवी ही सही ,पर है ये एकदम खरी..

जैसे जियूंगी बस वैसी ही बन जाएगी..

अब मज़बूत हूँ मैं ,नहीं सहमी या डरी..

 

क्योंकि.....

 खुद को सौंपा अब मैंने 'उनको '

 


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Comment

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Comment by Roopchandrashastri Mayank on June 22, 2012 at 9:06pm
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के  <a href="http://charchamanch.blogspot.in/">चर्चा मंच</a>  पर भी होगी!
Comment by Lata R.Ojha on January 30, 2011 at 12:13am
धन्यवाद  आपका..प्रयत्न करूंगी  गणेश भाई :)

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 29, 2011 at 8:57pm
बेहद सुंदर प्रस्तुति, लता जी आपकी कविता और प्रस्तुति दोनों खुबसूरत है , बधाई इस पोस्ट हेतु, १ फरवरी से ३ फरवरी तक आयोजित "OBO लाइव महा इवेंट" मे भी आपकी सहभागिता अपेक्षित है |

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