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कुछ भी तो स्थिर नहीं..
ना घूमती धरा
ना ही बहती हवा..
ना कलकल करती नदिया ..
ना झर-झर झरता झरना..

ना महमहाती सुगंध ..
ना भंवरों का गुंजन..
ना खरखराते पत्ते..
ना ही झूमते हुए वृक्ष..

ना तो कूदते उछलते  पशु ..
ना ही फुदकते उड़ते पंछी ...
क्या स्थिर है मन ?
या स्थिर है ये तन ?
या वाणी ही?

ना नैन स्थिर ना होंठ ही ..
ना ह्रदय स्थिर ना विचार..
ना जीवन मूल्य
ना जीवन का मोल ..
ना जीविका ना जीवनी ..

तो क्या है स्थिर..?
हर मोड़ का छोर ..
वो जो चहुँ ओर ..
हर एक का मीत ..
वो अद्भुत गीत..

वो अमृत जो हर एक पीता..
जिसकी चर्चा करती गीता ..
वो अमोल सम्पूर्ण..
हरे सबका पीर ..वो स्थिर..

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Comment by Lata R.Ojha on January 31, 2011 at 9:00pm
धन्यवाद वंदना जी :)
Comment by Lata R.Ojha on January 30, 2011 at 11:20pm
धन्यवाद  अरुण कुमार पांडे जी :)
Comment by Abhinav Arun on January 30, 2011 at 10:34pm
सचमुच कुछ भी स्थिर  नहीं |एक अच्छी रचना बधाई !!!
Comment by Lata R.Ojha on January 30, 2011 at 1:48pm
आभार गणेश भाई :)

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 30, 2011 at 12:27pm

कुछ भी तो स्थिर नहीं..


आप का कथन सही है लता जी, कुछ भी स्थिर नहीं है , जब हमारी धरती ही चलायमान है तो कुछ भी स्थिर रह कैसे सकता है ... बेहद खुबसूरत कविता की प्रस्तुति , धन्यवाद |

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