For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

!!! चाल ढार्इ घर चले अब !!!

बन फजल हर पल बढ़े चल,
दासता के देश में अब।
रास्ते के श्वेत पत्थर
मील बन कर ताड़ते हैं
दंग करती नीति पथ की,
चाल ढार्इ घर चले अब।1

भूख पीड़ा सर्द रातें
राह पर अब कष्ट पलते
भ्रूण हत्या पाप ही है
राम के बनवास जैसा
साधु पहने श्वेत चोला
चाल ढार्इ घर चले अब।2

रोजगारी खो गर्इ है
रेत बनकर उड़ चुकी जो
फिर बवन्डर घिर रहा है
घूस खोरी सी सुनामी
दर-बदर अस्मत हुर्इ पर
चाल ढार्इ घर चले अब।3

कत्ल का अंजाम क्या है?
बस रर्इसों के सफर सम
तंत्र का यह श्वेत पत्रक
प्रेम का इतिहास कहता
फिर रसायन रस पढ़ा कर
चाल ढार्इ घर चले अब।4

के0पी0सत्यम-मौलिक व अप्रकाशित

Views: 634

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 25, 2013 at 11:09pm

भाई केवल प्रसादजी, यदि इस नवगीत को कथ्य, तथ्य, शिल्प, प्रस्तुति और संप्रेषणीयाता सबके हिसाब से मेरी पढ़ी हुई आपकी अबतक की सर्वश्रेष्ठ रचना कहूँ तो अतिशयोक्ति न होगी.बिम्ब और प्रतीकों का इतना सार्थक प्रयोग आपकी रचनाओं में मेरी दृष्टि में पहली बार हो रहा है.


आपने इस नवगीत में चार बन्द रखे हैं, और चारों के इंगित इतने सान्द्र हैं कि सीधे हृदयतल की तह तक पहुँचते हैं.
आपने तुकान्तता की बाध्यता नहीं रखी है, लेकिन ’फाइलातुन’ की सहज और प्रवहमान आवृति ने अंतर्गेयता की दशा को अति उच्च बनाये रखा है. जो आपकी दिनोदिन समृद्ध होती जा रही काव्य-समझ की अति प्रखर बानग़ी है.
आपके समृद्ध अनुभव से किसी मंच को ऐसी ही रचनाओं की अपेक्षा होगी.

हृदय की अतल गहराइयों से आपको बधाई कह रहा हूँ. ऐसी प्रखर और गंभीर रचना को साझा कराने के लिए सादर धन्यवाद.

हाँ एक बात अवश्य निवेदित करूँगा, कि, आखिरी बन्द में दूसरी पंक्ति को बस रईसों का सफ़र है किया जा सकता है क्या ? वस्तुतः यह कोई सुझाव न हो कर मेरा एक निवेदन भर है.
शुभ-शुभ

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on December 21, 2013 at 7:03pm

आ0 कुन्ती जी, आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on December 21, 2013 at 7:01pm

आ0 धामी भाई जी, आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on December 21, 2013 at 6:58pm

आ0 भण्डारी भाई जी, आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by coontee mukerji on December 20, 2013 at 2:11pm

कत्ल का अंजाम क्या है?
बस रर्इसों के सफर सम
तंत्र का यह श्वेत पत्रक
प्रेम का इतिहास कहता
फिर रसायन रस पढ़ा कर
चाल ढार्इ घर चले अब।...........बहुत सुंदर.केवल जी..हार्दिक बधाई.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 20, 2013 at 7:37am

आदरनीय केवल भाई सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिये बधाई..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 19, 2013 at 7:41pm

आदरनीय केवल भाई , खूब सूरत रचना के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on December 19, 2013 at 6:26pm

आदरणीय  मीना जी  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आप सभी का हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on December 19, 2013 at 6:25pm

आदरणीय अन्नपूर्णा जी  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आप सभी का हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on December 19, 2013 at 6:25pm

आदरणीय  श्याम नारायणजी  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आप  का हार्दिक आभार। सादर,

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service