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पञ्च चामर छन्द = की विधा मॆं मॆरा
प्रथम प्रयास आप सबकॆ श्री चरणॊं मॆं
==========================
 रुदान्त कंठ मातृ-भूमि वॆदना पुकारती,
प्रकॊप-दग्ध दॆश-भक्ति भावना हुँकारती,
वही सपूत धन्य भारती पुकारती जिसॆ,
अखंड सत्य-धर्म साधना सँवारती जिसॆ,


करॊ पुनीत कर्म ज़िन्दगी सँवारतॆ चलॊ ॥
सुहासिनीं सुभाषिणीं सदा पुकारतॆ चलॊ ॥१॥

खड़ा रहा अड़ा रहा डरा नहीं कु-काल सॆ,
डटा रहा नहीं हटा हिमाद्रि तुंग भाल सॆ, 
महाव्रती सपूत रक्त-सिन्धु मॆं नहा गया,
धरा प्रणम्य दॆश-भक्ति जाह्नवी बहा गया,


प्रचण्ड राष्ट्र-भक्ति चॆतना दुलारतॆ चलॊ ॥२॥
सुहासिनीं सुभाषिणीं सदा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

उखाड़ दीं जड़ॆं गड़ी हुई अथाह भ्रान्ति की,
दहाड़ता चला गया जला मशाल क्रांति की,
अपूर्ण है स्वतंत्रता अपूर्ण शान्ति माल है,
अपूर्ण राष्ट्र संविधान जीर्ण राष्ट्र - भाल है,


प्रशस्त मार्ग क्रान्ति दूत हॊ हुँकारतॆ चलॊ ॥३॥
सुहासिनीं सुभाषिणीं सदा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

अनादि धैर्य-वान हॊ अजॆय हॊ निशंक हॊ,

प्रचण्ड तप्त सूर्य हॊ पयॊधि हॊ मयंक हॊ,
जवान हिन्द दॆश कॆ किसान हिन्द दॆश कॆ,
अबॊध बाल बृद्ध भी महान  हिन्द दॆश कॆ,


प्रदीप्य दीप्य स्नॆह आरती उतारतॆ चलॊ ॥४॥
सुहासिनीं सुभाषिणीं सदा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

कवि - "राज बुन्दॆली"
१६/१२/२०१३
पूर्णत: अप्रकाशित एवं मौलिक रचना,,,

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Comment

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Comment by कवि - राज बुन्दॆली on December 17, 2013 at 3:06pm

आदरणीय,,,,, डा. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी,,,,,इस स्नेहाशीष हेतु बहुत बहुत आभार आपका,,,,,आपने जो शिल्प विधान दर्शाया है, यह रचना बिल्कुल उसी शिल्प विधान में है,,,,,धन्यवाद,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on December 17, 2013 at 3:02pm
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2013 at 2:38pm

राज बुन्देली जी

जय शंकर प्रसाद जी की प्रसिद्ध रचना 'हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध  शुद्ध भारती i स्वयम्प्रभासमुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती ii ' से अनुप्राणित इस सुन्दर रचना के लिए आपको बधाई i आपने इसके विधान का संकेत नहीं किया i मेरी समझ में शायद  ऐसा होगा -

 

रमा रमा रमा रमा रमा रमा रमा रमा  i    आपको पुनः बधाई  i

Comment by Sushil Sarna on December 17, 2013 at 1:50pm

रुदान्त कंठ मातृ-भूमि वॆदना पुकारती,
प्रकॊप-दग्ध दॆश-भक्ति भावना हुँकारती,
वही सपूत धन्य भारती पुकारती जिसॆ,
अखंड सत्य-धर्म साधना सँवारती जिसॆ,


करॊ पुनीत कर्म ज़िन्दगी सँवारतॆ चलॊ ॥
सुहासिनीं सुभाषिणीं सदा पुकारतॆ चलॊ ॥१॥..........waaaaaaaaaaaaah waaaaaaaaaaaah kya rachna aur rachna ke paavan bhaav hain...shabd shabd men oorja hai....natmastak hoon SIR nishabd hoon aapkee dilkash prastuti pr....haaaaaaaaaaaardik badhaaee sveekaar krain aadrneey Kavi Raj Bundeli jee...jay ho

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