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गजल-लाश मुहब्बत की उठाता फिरता हूँ

लाश मुहब्बत की उठाता फिरता हूँ
गीत गमों के गुनगुनाता फिरता हूँ

काश के मिल जाये खुशी का पल कोई
हाथ फकीरों को दिखाता फिरता हूँ

नींद हमें आती नहीं दुनिया वालो
साथ सितारों को जगाता फिरता हूँ

हो न अँधेरा आशियाने में उनके
सोच यही खुद को जलाता फिरता हूँ

खूब किया है फैसला किस्मत तूने
जख्म भरे दिल को छुपाता फिरता हूँ

उमेश कटारा
मौलिक एंव अप्रकाशित



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Comment

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Comment by Abhinav Arun on November 16, 2013 at 6:29pm

काश के मिल जाये खुशी का पल कोई
हाथ फकीरों को दिखाता फिरता हूँ

                  ...क्या खूब लाजवाब है हर शेर मुकम्मल ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल करे श्री उमेश जी बधाई

Comment by विजय मिश्र on November 16, 2013 at 5:55pm
क्या आशनाई है ? बेतकल्लुफी से दिल को बयाँ किया जनाब , दिली दाद कुबूल करें .
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 16, 2013 at 4:44pm

आदरणीय उमेश जी आपकी इस ग़ज़ल का हर शेर मुझे बेहद पसंद आया ..तहे दिल बधाई के साथ 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on November 16, 2013 at 4:40pm

आह ! दिल से एक आह निकल गयी है 

क्या कहूँ अलफ़ाज़ नहीं है मेरे पास 

लख लख बधाईयाँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 16, 2013 at 12:00pm
आदरणीय उमेश भाई , बहुत सुन्दर गज़ल कही है आपने !!!! मात्रा भार ( बह्र ) अगर लिखना दें तो समझने मे आसानी होगी !!!!! आपको बहुत बधाई !!!
Comment by Meena Pathak on November 16, 2013 at 11:57am

बहुत सुन्दर गज़ल .. बधाई स्वीकारें आदरणीय | सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 16, 2013 at 11:15am

मुहब्बत की लाश , उफ़ तोबा तोबा , इतनी मायूसी  i अच्छी ग़ज़ल कही आपने  i  आपसे काफी उम्मीदें है  i

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