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!!! सत्य खुलकर पारदर्शी हो गई !!!

!!! सत्य खुलकर पारदर्शी हो गई !!!
बह्र - 2122 2122 212

आज कल की धूप हल्की हो गई।
रंग बातें अब चुनावी हो गई।।

आईना तो खुद बड़ा जालिम यहां
सत्य खुल कर पारदर्शी हो गई।

प्यार का अहसास सुन्दर सांवरा,
दर्द बाबुल की कहानी हो गई।

जब कभी उम्मीद मुशिकल से जगे,
आस्था भी दूरदर्शी हो गई।

आईना को तोड़कर बोले खुदा,
श्वेत दाढ़ी आज पानी हो गई।

शोर है कलियुग यहां दानव हुआ,
साधु सन्तों सी निशानी हो गई।

आज केवल धन गुमां अहसास है,
जोर की लाठी चलानी हो गई।

बोल 'सत्यम' सांस भी जब तक चले,
रहनुमा भी बेईमानी हो गई।

के0पी0सत्यम / मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 13, 2013 at 6:33pm

आ0 अरून अनन्त भाईजी,  आपके स्नेह हेतु आपका तहेदिल से आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 13, 2013 at 6:31pm

आ0 सुशील भाईजी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका तहेदिल से आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 13, 2013 at 6:29pm

आ0 सौरभ सर जी,  प्रस्तुत गजल पर आपकी विस्तृत चर्चा से मेरे मन की अशांति दूर हुई। अभी मुझे बहुत कुछ सीखना है, खास कर इनके दोषों के बारे में। आपका तहेदिल से आभार।  सादर,

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 13, 2013 at 2:18pm

आदरणीय केवल भाई जी बहुत ही सुन्दर प्रयास किया है आपने इस हेतु बधाई स्वीकारें आदरणीय श्री सौरभ सर की विस्तृत टिपण्णी पर गौर फरमाएं.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 12, 2013 at 10:04pm

आज कल की धूप हल्की हो गई।
रंग बातें अब चुनावी हो गई।।........... शुतुर्गुर्बा का दोष है सानी में. बातें के साथ क्रिया बहुवचन की होगी.

आईना तो खुद बड़ा जालिम यहां
सत्य खुल कर पारदर्शी हो गई।.......... सत्य का लिंग परिवर्तन हो गया है, यह तो एक बात. सत्य पारदर्शी ही होता है, केवल भाईजी.

प्यार का अहसास सुन्दर सांवरा,
दर्द बाबुल की कहानी हो गई।.........  .भावुकता ध्यानाकर्षित करती तो है.

जब कभी उम्मीद मुशिकल से जगे,
आस्था भी दूरदर्शी हो गई।................ इस शेर के उला में हुए दोष पर बात चल चुकी है, भाईजी. आपने यथोचित उत्तर भी दिया है, किन्तु उत्तर से मन संतुष्ट नहीं हुआ.

आईना को तोड़कर बोले खुदा,
श्वेत दाढ़ी आज पानी हो गई।............ इस शेर का स्पष्ट अर्थ मुझे नहीं सूझा.

शोर है कलियुग यहां दानव हुआ,
साधु सन्तों सी निशानी हो गई।........... बहुत खूब !!

आज केवल धन गुमां अहसास है,
जोर की लाठी चलानी हो गई।............... धन गुमां अहसास ! ऐसे प्रयोग से बचना उचित माना जाता है.

बोल 'सत्यम' सांस भी जब तक चले,
रहनुमा भी बेईमानी हो गई।..  .........  मक्ते से कुछ स्पष्ट नहीं हुआ.

भाई केवलजी, बह्र में मिसरों को रखना ग़ज़लकार पहला कर्तव्य है. परन्तु, इस ग़ज़ल को देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों मात्राओं या वज़्न के हिसाब से मिसरों में शब्द भरे गये हैं. आप अपनी प्रस्तुति पर थोड़ा समय दें इसका सुझाव कई बार दिया जा चुका है. लिखने को तो हम सभी लिखते हैं. लेकिन उसके लिए तैयारी करना और संयत हो कर लिखना उचित माना जाता है.
शुभ-शुभ
 

Comment by Sushil.Joshi on November 12, 2013 at 9:25pm

आ0 केवल भाई..... भावों का सुंदर संप्रेषण है....... शिल्प के विषय में अनभिज्ञ हूँ इसलिए कुछ नहीं कहूँगा..... टंकण त्रुटियाँ आपकी मजबूरी है...... यदि थोड़ा सा प्रयास करें तो यूनिकोड इंस्टाल कर उसके की-बोर्ड पर हाथ बैठाएँ..... फिर परिवर्तित करने का सारा झंझट ही ख़त्म हो जाएगा.......

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 8:06pm

आ0 आशुतोष भाई  जी,   आपके स्नेह एवं गजल पर उत्साहवर्धन टिप्पणी हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 8:04pm

आ0 गीतिका जी,  आपके स्नेह  हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 8:03pm

आ0 मीना जी,  आपके स्नेह एवं गजल पर उत्साहवर्धन टिप्पणी हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 8:01pm

आ0 राम शिरोमणि भाई जी,  आपके स्नेह एवं गजल पर उत्साहवर्धन टिप्पणी हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

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