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कभी औरों से टकराते कभी खुद से खफा होते ।

न आते ज़िन्दगी में तुम तो मौसम ए खिजां होते ।

मोहब्बत की पनाहों में हुये हालात ऐसे हैं ,

न खामोशी से छुपते हैं न लफ़्ज़ों से बयाँ होते ।

दिले नादाँ को समझायें ज़रा सी बात कैसे हम ,

प्यार के हादसे अक्सर दिलों के दरमियाँ  होते ।

प्यार कहने की ख्वाहिश में सिमट जाता है अपना दिल,

खुदा तेरी तरह होते जो हम भी बेज़ुबाँ होते ।

खुदी का घर मिटाये बिन सुकूँ का दर नही मिलता ,

अगर ये इश्क ना होता कहाँ जाके फना होते ।

ये दरिया के किनारे हैं जो सदियों से मचलते हैं ,

मगर कुछ बात ऐसी है न मिलते ना ज़ुदा होते ।

मौलिक व अप्रकाशित

      नीरज

Views: 836

Comment

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Comment by Neeraj Nishchal on October 30, 2013 at 7:15pm

भाई शिज्जू जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका

Comment by annapurna bajpai on October 30, 2013 at 6:23pm

आ0 नीरज जी खूबसूरत भावों से युक्त आपकी गजल के लिए आपको बहुत बधाई । 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 30, 2013 at 3:54pm

 

मोहब्बत की पनाहों में हुये हालात ऐसे हैं ,

न खामोशी से छुपते हैं न लफ़्ज़ों से बयाँ होते ।...........बहुत सुन्दर क्या बात है 

बधाई हो बहुत बहुत बधाई हो 

Comment by Sushil.Joshi on October 29, 2013 at 10:23pm

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति है आ0 नीरज भाई जी..... हार्दिक बधाई.....

दिले नादाँ को समझायें ज़रा सी बात कैसे हम ,

दिलों के हादसे अक्सर जहाँ में बेवज़ह होते ।........ यहाँ पर काफ़िये का निर्वहन नहीं हो रहा है शायद.......... देखिएगा...

Comment by विजय मिश्र on October 29, 2013 at 5:44pm
"खुदी का घर मिटाये बिन सुकूँ का दर नही मिलता ," - बहुत प्यारी गजल और इस लाइन में तो सूफियाना अन्दाज भी है .बधाई हो नीरजजी
Comment by ram shiromani pathak on October 29, 2013 at 11:09am

प्यार कहने की ख्वाहिश में सिमट जाता है अपना दिल,

खुदा तेरी तरह होते जो हम भी बेज़ुबाँ होते ।

खुदी का घर मिटाये बिन सुकूँ का दर नही मिलता ,

अगर ये इश्क ना होता कहाँ जाके फना होते ।///वाह वाह भाई  बहुत खूब ///हार्दिक बधाई आपको 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 29, 2013 at 10:53am

बहुत सुंदर गजल, आदरणीय नीरज जी, इस शेर पर खास बधाई स्वीकारें

खुदी का घर मिटाये बिन सुकूँ का दर नही मिलता ,

अगर ये इश्क ना होता कहाँ जाके फना होते ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 29, 2013 at 9:35am

आदरणीय नीरज भाई , बहुत लाजवाब गज़ल कही है !!! आपको ढेरों बधाई !!!!

मोहब्बत की पनाहों में हुये हालात ऐसे हैं ,

न खामोशी से छुपते हैं न लफ़्ज़ों से बयाँ होते । वाह भाई वाह !!!

आदरणीय तीसरे शेर मे क़ाफिया नही है , कृपया फिर से देख लें !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 29, 2013 at 9:23am

//ये दरिया के किनारे हैं जो सदियों से मचलते हैं ,

मगर कुछ बात ऐसी है न मिलते ना ज़ुदा होते //

अच्छी भावाभिव्यक्ति है भाई नीरज जी बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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