१२२२,१२२२,१२२२,१२२२
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वो लेतें है शिकायत में, कि लेतें है मुहब्बत में,
हमारा नाम लेतें है वो अपनी हर ज़रूरत में,
***
मै राजा और तुम रानी, ये दुनियाँ सल्तनत अपनी,
हक़ीक़त में नहीं होता, ये होता है हिक़ायत में.
***
ये रुतबा, ओहदा, शुहरत, सभी हमनें भी देखें है,
छुपा है कुछ, नुमाया कुछ, शरीफ़ों की शराफ़त में.
***
मेरे ही क़त्ल का इल्ज़ाम क़ातिल ने मढ़ा मुझ पर,
गवाही भी वही देगा, वो ही मुंसिफ़ अदालत में.
***
न तुम शीरीं न मै फ़रहाद, लैला तुम न मै मजनूं
जुदा होना ही बेहतर है, रखा क्या है बग़ावत में.
***
धडक मत ऐ दिले नादाँ, किसी की याद आई है,
लगे शोरे क़यामत सी, तेरी धकधक इबादत में.
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निगाहें, दिल, किताबें, ख़त, सितारें, चाँद, ग़ज़लें, ‘नूर’
लिखा इतना ही था मक़तूल शाइर की वसीयत में.
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निलेश 'नूर' - मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
हमारा ज़िक्र तुम करते हो अक्सर हर शिक़ायत में,
मगर शामिल रहे है हम तुम्हारी हर ज़रूरत में.
अक्सर का अर्थ है कभी कभी
हर शिकायत का मतलब है - प्रत्येक में
ये विरोधाभास है
इसे ऐसे कर लीजिए
हमारा ज़िक्र करते हो तुम अपनी हर शिक़ायत में,
न तुम शीरीं न मै फ़रहाद, लैला तुम न मै मजनूं
जुदा होना ही बेहतर है, रखा क्या है बग़ावत में. .................वाह! सही फरमाया है जनाब.
***
आदरणीय शानदार ग़ज़ल हुई है ...
ये रुतबा, ओहदा, शुहरत, सभी हमनें भी देखें है,
छुपा है कुछ, नुमाया कुछ, शरीफ़ों की शराफ़त में.
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मेरे ही क़त्ल का इल्ज़ाम क़ातिल ने मढ़ा मुझ पर,
गवाही भी वही देगा, वो ही मुंसिफ़ अदालत में. ..ये दोनों शेर मुझे बेहद पसंद आये ..सादर
आदरणीय वीनस केसरी जी,
आप ने जिस पहलू पर ध्यान दिलाया है वो पहले पहल मैंने भी सोचा था लेकिन थोड़ी सी लापरवाही के चलते इग्नोर कर दिया था. आप का बहुत आभारी हूँ की आप ने इसे उजागर किया और मुखे सोचने पर विवश किया की क्या ये मतला किसी और तरीके से मै कह सकता हूँ या नही .... इसी विचार मंथन से ये नया मतला निकला है ... आप की नज्र करता हूँ ...
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हमारा ज़िक्र तुम करते हो अक्सर हर शिक़ायत में,
मगर शामिल रहे है हम तुम्हारी हर ज़रूरत में.
आभार
भाई जी
पूरी ग़ज़ल के लिए बेहतर दाद क़ुबूल फरमाएं ,,, अच्छी ग़ज़ल कही है ....
निवेदन है कि आपके मतले के मिसरा ए उला में जम का पहलू नुमाया है ... इसे तुरंत बदलिए
किसी मंच पर पढ़ देंगे तो खतरनाक ढंग से हूट हो जायेंगे ... :))))))))
शुक्रिया केवल जी, गिरिराज जी एवं संदीप जी .... आभार
आदरणीय नीलेश भाई , बहुत खूबसूरत , कामयाब गज़ल कही है !!!! मक्ता औभी खूबसूरत कही !!!!! तहे दिल से दाद कुबूल करें !!!!!
निगाहें, दिल, किताबें, ख़त, सितारें, चाँद, ग़ज़लें, ‘नूर’
लिखा इतना ही था मक़तूल शाइर की वसीयत में. --------- वाह भाई क्या बात है !!!!!!
वाह वाह साहब क्या ही शानदार अशआर कहे हैं आपने
इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद क़ुबूल करें
आदरणीय नीलेश भार्इ जी! सादर प्रणाम! वाह! बेहतरीन गजंल।------
//निगाहें, दिल, किताबें, ख़त, सितारें, चाँद, ग़ज़लें, ‘नूर’
लिखा इतना ही था मक़तूल शाइर की वसीयत में.// तहेदिल से दाद कुबूल करे। सादर,
शुक्रिया आदरणीय राणा प्रताप सिंह जी, शिज्जू शकूर जी, अभिनव जी, राम अवध जी .... आप जैसे बड़े और स्थापित ग़ज़लकारों की दाद बहुत हौसला देतीं है.
स्नेह बनाएं रखिये
आभार
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