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ऐ खुशी तूने अगर मुझको पुकारा ही न होता - शिज्जु शकूर

बह्रे रमल मुसम्मन सालिम(2122 2122 2122 2122)

संग तेरे मैंने कोई पल गुज़ारा ही न होता

ऐ खुशी तूने अगर मुझको पुकारा ही न होता

 

तूने ऐ जज़्बा-ए-दिल मुझको सँवारा ही न होता

आइने में लफ़्ज़ के तुझको उतारा ही न होता

 

रह गया था मैं कहीं खो कर जहां की वुसअतों मे                        वुसअत= व्यापकता

गर मुहब्बत की न होती तो सहारा ही न होता

 

रात की जल्वागरी होती अधूरी रौनकें भी

चाँद की जो बज़्म में कोई सितारा ही न होता

 

इस ज़माने में बने मा'बूद इंसां लूटते हैं                                  मा'बूद =जिसकी इबादत की जाये

सच न कहता मैं तो दुश्मन शह्र सारा ही न होता

 

-मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 4, 2013 at 10:39pm

रात की जल्वागरी होती अधूरी रौनकें भी

चाँद की जो बज़्म में कोई सितारा ही न होता-----वाह्ह्ह्ह शिज्जू जी गज़ब का शेर 

बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है मजा आ गया दिली दाद कबूलें ,वैसे इसी बहर पर एक ग़ज़ल मैंने भी हाल ही मैं लिखी है जल्दी ही पोस्ट करुँगी |

 

Comment by MAHIMA SHREE on October 4, 2013 at 10:28pm

रात की जल्वागरी होती अधूरी रौनकें भी

चाँद की जो बज़्म में कोई सितारा ही न होता

 

इस ज़माने में बने मा'बूद इंसां लूटते हैं                                 

सच न कहता मैं तो दुश्मन शह्र सारा ही न होता   वाह वाह क्या बात है  आ. शिज्जू जी शानदार .. हर शे'अर लाजवाब ..बधाई आपको

Comment by Sushil.Joshi on October 4, 2013 at 9:40pm

आदरणीय शिज्जू भाई जी... इस शानदार प्रस्तुति के लिए आप बधाई के पात्र हैं....

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 4, 2013 at 7:59pm

अनेक अनूठे भाव लिए उम्दा प्रस्तुति ! आभार  

Comment by रमेश कुमार चौहान on October 4, 2013 at 7:46pm

आदरणीय शिज्जूजी सुंदर भाव से परिपूर्ण इस रचना पर कोटिश बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 4, 2013 at 7:25pm

भाई सारथी जी, मोहतरम जनाब नादिर साहब, आदरणीय गिरिराज सर, आदरणीय बागी जी, आदरणीया शालिनी जी आपने मेरी रचना को जो समय और इतना मान दिया है उसके लिये मैं आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ, उम्मीद करता हूँ आप सभी का स्नेह ऐसे ही बना रहेगा,


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 4, 2013 at 6:29pm

//सच न कहता मैं तो दुश्मन शह्र सारा ही न होता//
वाह वाह क्या कहने भाई सिज्जू जी, सुन्दर मिसरा लगा, बधाई । 

Comment by shalini rastogi on October 4, 2013 at 6:18pm

इस ज़माने में बने मा'बूद इंसां लूटते हैं                                  मा'बूद =जिसकी इबादत की जाये

सच न कहता मैं तो दुश्मन शह्र सारा ही न होता.......... क्या बात कही है आदरणीय .. बहुत सुन्दर भाव प्रस्तुत करती ग़ज़ल !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 4, 2013 at 6:10pm

आदरणीय शिज्जू भाई , बहुत सुन्दत गज़ल कही है भाई आपने !!! वाह !!

रह गया था मैं कहीं खो कर जहां की वुसअतों मे                      

गर मुहब्बत की न होती तो सहारा ही न होता ---------------------- इस शेर के लिये ढ़ेरों दाद कुबूल कीजिये !!

 

Comment by नादिर ख़ान on October 4, 2013 at 5:47pm

रह गया था मैं कहीं खो कर जहां की वुसअतों मे                       

गर मुहब्बत की न होती तो सहारा ही न होता...........

 

रात की जल्वागरी होती अधूरी रौनकें भी

चाँद की जो बज़्म में कोई सितारा ही न होता..........

सुंदर गज़ल के लिए बधायी शिज्जू  जी  बहुत खूब.....

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