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ग़ज़ल : सच वो थोड़ा सा कहता है

बह्र : मुस्तफ्फैलुन मुस्तफ्फैलुन

----

सच वो थोड़ा सा कहता है

बाकी सब अच्छा कहता है

 

दंगे ऐसे करवाता वो

काशी को मक्का कहता है

 

दौरे में जलते घर देखे

दफ़्तर में हुक्का कहता है

 

कर्मों को माया कहता वो

विधियों को पूजा कहता है

 

जबसे खून चखा है उसने

इंसाँ को मुर्गा कहता है

 

खेल रहा वो कीचड़ कीचड़

उसको ही चर्चा कहता है

 

चलता है जो खुद सर के बल

वो सबको उल्टा कहता है

 

तेरा क्या होगा रे ‘सज्जन’

अंधे को अंधा कहता है

--------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 3, 2013 at 3:23pm

जबसे खून चखा है उसने

इंसाँ को मुर्गा कहता है आदरणीय सज्जन जी आपकी इस बेहतरीन घज्ला का ये शेर मुझे बेहद भाया ..सादर बधाई के साथ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on October 3, 2013 at 9:00am

आदरणीय धर्मेंद्र जी, आपकी हर गज़ल का हर एक अश'आर इतना उम्दा होता है कि बार-बार गुनगुनाकर पढ़ता हूँ. हृदय से बधाई...........

Comment by vandana on October 3, 2013 at 7:32am

जबसे खून चखा है उसने

इंसाँ को मुर्गा कहता है

तीव्र भावनाओं की प्रस्तुति .....!!!

Comment by वीनस केसरी on October 3, 2013 at 2:21am

कहें काले को हम काला महोदय
ग़ज़ल में ये नहीं अच्छा महोदय

ग़ज़लियत का ज़रा हम ध्यान रक्खें
तो फिर हो जाए क्या से क्या महोदय

नज़र से पेश करते हाल दिल का
ग़ज़ल  का शेर हो जाता महोदय .........

Comment by Sushil.Joshi on October 2, 2013 at 9:49pm

दौरे में जलते घर देखे

दफ़्तर में हुक्का कहता है..... क्या ख़ूब कहा आदरणीय धर्मेन्द्र जी..... वाह...बधाई हो आपको इस शानदार सार्थक गज़ल के लिए...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2013 at 9:38pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , बहुत शानदार गज़ल कही है !!

चलता है जो खुद सर के बल

वो सबको उल्टा कहता है

 

तेरा क्या होगा रे ‘सज्जन’

अंधे को अंधा कहता है ------------------ इन दो शेरों के लिये ढ़ेरों बधाई !!

Comment by MAHIMA SHREE on October 2, 2013 at 8:31pm

बहुत ही शानदार ..... निशब्द कर दिया आदरणीय ..बधाई स्वीकार करें

 

Comment by रविकर on October 2, 2013 at 5:52pm

गजब गजब गजब -
बड़ा नाराज है भाई -
सादर -
शुभकामनायें आदरणीय-

कृपया ध्यान दे...

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