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टेरत टेरत - एक कुंडली छंद

टेरत टेरत जुग भया, सुधि नहि लीन्ही मोहि   

बौरा बन घूमत फिरा, मिला न मुझको तोहि   
मिला न मुझको तोहि, कहाँ मैं जग में ढूंढूं
कहौ मुझी से कोहि , कौन सी माला फेरूँ 
कह सागर कविराय, मनहि को फेरत फेरत 
मिल जावेगा तोय ,स्वयम को टेरत टेरत  
आशीष ( सागर सुमन ) 

Views: 479

Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on September 30, 2013 at 12:53pm

आदरणीय आशीष भाई कुण्डलिया छंद पर आपका प्रयास धीरे धीरे रंग ला रहा है प्रयासरत रहें, हार्दिक बधाई इस कुण्डलिया छंद पर.

Comment by vijay nikore on September 30, 2013 at 4:44am

आदरणीय आशीष जी, हार्दिक बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 29, 2013 at 9:26am

बहुत सुदर भाव लिए छंद रचना के लिए बधाई 

Comment by Meena Pathak on September 29, 2013 at 8:10am

बहुत सुन्दर कुण्डलिया छन्द .. बधाई स्वीकारें आदरणीय 

Comment by annapurna bajpai on September 28, 2013 at 12:09am

आ0 सुंदर कुण्डली छंद हेतु बधाई स्वीकारें । 

Comment by Saarthi Baidyanath on September 27, 2013 at 8:08pm

शीर्षक आकर्षक है श्रीमान.....रचना भी सुगढ़ लगी :)


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 27, 2013 at 7:16pm

आदरणीय आशीष भाई , बहुत सुन्दर , कुन्डलिया छन्द , वाह !! बहुत बधाई !!

Comment by ram shiromani pathak on September 27, 2013 at 5:10pm

बहुत ही सुन्दर कुण्डलिया छंद आदरणीय //हार्दिक  बधाई आपको //सादर

Comment by Abhinav Arun on September 27, 2013 at 4:26pm

मिल जावेगा तोय ,स्वयम को टेरत टेरत  ..भाव गहरे हैं बहुत बधाई सुन्दर रचना !!

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