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ग़ज़ल:मुजरिम मैं नहीं,पर मुफ़लिसी..........

मुजरिम मैं नहीं पर मुफ़लिसी गोयाई छीन लेती है
दौलत आज भी इन्साफ की बीनाई छीन लेती है

हैं जौहर आज भी मुझ में वही तेवर भी हैं लेकिन
सियासत अब मेरे हाथों से रोशनाई छीन लेती है

नफरत थक गयी दामन मेरा मैला न कर पाई
मोहब्बत मेरे दामन से हर रुसवाई छीन लेती है

यही रहज़न कभी रहबर हुआ करता था बस्ती का
ग़रीबी रंग में आती है तो अच्छाई छीन लेती है


~सालिम शेख
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by saalim sheikh on September 17, 2013 at 1:30pm

मोहतरम वीनस केसरी जी ज़हे नसीब कि आप के क़ीमती तब्सरे ने मेरे अशआर की वक़्अत मे इज़ाफ़ा किया, आगे से मैं ख्याल रखूँगा  की गज़ल की तमाम बारीकियों का ख़याल रख सकूँ

Comment by Abhinav Arun on September 17, 2013 at 5:56am

शेर अच्छे कह रहे हैं ...कक्षाएं ज्वाइन कर लें ...ग़ज़लगोई निखर जायेगी :-) शुभकामनायें और बधाई आदरणीय !!

Comment by वीनस केसरी on September 17, 2013 at 12:27am

काफ़िया रदीफ़ का सुन्दर निर्वाह किया है बधाई स्वीकारें ....
ग़ज़ल विधान के अन्य तत्वों का निर्वाह कर ले जाते तो शानदार ग़ज़ल हो जाती 
शुभकामनाएं

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 17, 2013 at 12:03am

बेहतरीन शेर कहे आपने, बधाई आपको आदरणीय सालिम साहब

Comment by saalim sheikh on September 16, 2013 at 6:29pm

आ0 गिरिराज भंडारी जी बहुत बहुत धन्यवाद


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 16, 2013 at 5:16pm

आदरणीय सलीम भाई , चारों शे र लाजवाब कहे  हैं आपने , आपको बहुत बहुत बधाई !!

Comment by saalim sheikh on September 16, 2013 at 1:52pm

आदरणीय अरुण शर्मा जी सराहना एवं मार्गदर्शन के लिए तहे दिल से शुक्रिया 

मैं आपका आभारी हूँ की आपने मेरे अशआर देखे और अपने कीमती मशवरों से नवाज़ा
आगे से मैं बह्र लिखने का ध्यान ज़रूर रखूँगा

Comment by saalim sheikh on September 16, 2013 at 1:41pm

आ0 श्याम नरेन वर्मा जी बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 16, 2013 at 11:02am

आदरणीय सालिम शेख भाई ओ बी ओ पर आपका हार्दिक स्वागत है, आपने चार अशआर पेश किये हैं यदि एक अशआर और जोड़ देते तो ग़ज़ल पूर्ण हो जाती साथ ही साथ बहर का भी लिख देंगे तो मुझे एवं ग़ज़ल सीख रहे अन्य मित्रों को ग़ज़ल को समझने एवं टिपण्णी करने में सहजता हो जाएगी.

भाई यदि आपके चार अशआर की बात करूँ तो दिल को छू लिया आपने, मतला ही ऐसा शानदार है कि बस वाह वाह कहने का बरबस ही मन कर जाता है, अंतिम शेर ने तो लूट ही लिया भाई. इन अशआरों पर मेरी ओर से दिली दाद कुबूल फरमाएं.

Comment by Shyam Narain Verma on September 16, 2013 at 10:48am
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………

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