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ग़ज़ल : बनना हो बादशाह तो दंगा कराइये

बह्र : २२१ २१२१ १२२१ २१२

 

सत्ता की गर हो चाह तो दंगा कराइये

बनना हो बादशाह तो दंगा कराइये

 

करवा के कत्ल-ए-आम बुझा कर लहू से प्यास

रहना हो बेगुनाह तो दंगा कराइये

 

कितना चलेगा धर्म का मुद्दा चुनाव में

पानी हो इसकी थाह तो दंगा कराइये

 

चलते हैं सर झुका के जो उनकी जरा भी गर

उठने लगे निगाह तो दंगा कराइये

 

प्रियदर्शिनी करें तो उन्हें राजपाट दें

रधिया करे निकाह तो दंगा कराइये

 

मज़हब की रौशनी में व शासन की छाँव में

करना हो कुछ सियाह तो दंगा कराइये

-----

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 1079

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 18, 2013 at 10:14pm

बहुत बहुत शुक्रिया ram shiromani जी

Comment by ram shiromani pathak on September 18, 2013 at 7:55pm

करवा के कत्ल-ए-आम बुझा कर लहू से प्यास

रहना हो बेगुनाह तो दंगा कराइये

 

कितना चलेगा धर्म का मुद्दा चुनाव में

पानी हो इसकी थाह तो दंगा कराइये

 

चलते हैं सर झुका के जो उनकी जरा भी गर

उठने लगे निगाह तो दंगा कराइये

वाह !! आदरणीय धर्मेन्द जी , लाजवाब गज़ल कही आपने,  हर शेर बेमिसाल हैं !!

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 15, 2013 at 9:07pm

बहुत बहुत शुक्रिया पियुष द्विवेदी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 15, 2013 at 9:07pm

 बहुत बहुत धन्यवाद 'वेदिका' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 15, 2013 at 9:06pm

बहुत बहुत शुक्रिया  विजय मिश्र जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 15, 2013 at 9:05pm

बहुत बहुत धन्यवाद बागी जी। आपने पसंद किया, लेखन सफल हुआ। 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 15, 2013 at 9:04pm

बहुत बहुत शुक्रिया annapurna bajpai जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 15, 2013 at 9:04pm

बहुत बहुत धन्यवाद अरुन शर्मा 'अनन्त' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 15, 2013 at 9:03pm

बहुत बहुत शुक्रिया रविकर जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 15, 2013 at 9:01pm

बहुत बहुत शुक्रिया डॉ. सूर्या बाली "सूरज" जी

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