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लघु कथा : रमजान (गणेश जी बागी)

क किलो मटन आज वास्तव में एक किलो का ही लग रहा था । मैंने तराजू और बाट पर नज़र दौड़ाई । मालूम हुआ दोनों बिल्कुल नये हैं । अभी पिछ्ले महीने ही मटन लेने आया था तो पुराना तराजू और घिसे हुए बाट थे । बाट के नीचे से लगा हुआ तब रांगा भी गायब था । एक किलो मटन मानो आठ सौ ग्राम का ही लगता था | 
दुकान पर मौजूद छोटू से मैने धीरे से पूछ ही लिया, "क्या बात है जी, नया तराजू, नये बाट?.." 
छोटू दुकान मालिक की नज़र बचा कर फुसफुसाया, "सर, रमजान का महीना है ना, मालिक का रोज़ा चल रहा है,  ईद बाद फिर वही ........"
  • समाप्त 
(मौलिक व अप्रकाशित)
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Comment by dr lalit mohan pant on August 11, 2013 at 2:36am

काश ! रमजान इतना लम्बा होता कि उम्र कट जाती    …. धरम ,करम होता और ईमान  ही ईश्वर  …. लघु का घनत्व बहुत ज्यादा है  …बधाइयाँ   … 

 

Comment by Shubhranshu Pandey on August 10, 2013 at 5:54pm

वाह.... समाज के पहलुओं पर इतना जोरदार वार करने में आप महारत रखते हैं.

वैसे...मटन बना कैसा था????? 

Comment by DR SHRI KRISHAN NARANG on August 10, 2013 at 2:30pm

Bahut hi sunder laghu katha, Baghi ji. Kam se Kam Ramadan ke mahine main to Imaandari se kuchh log kaam karte hain. Par saare nahin. 

Comment by coontee mukerji on August 10, 2013 at 12:37pm

क्या तीरछी धार मारा है.....सादर

Comment by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on August 10, 2013 at 6:49am

:) ... सुन्दर कहानी, लघु तो सिर्फ  नाम की है.... ईमान और इरादों पर करारा व्यंग है... सादर 

Comment by MAHIMA SHREE on August 9, 2013 at 7:26pm

आदरणीय बागी ही ..वाह !! बाजारवाद  कैसे दिन ईमान को बेच देती है इस  कटु यथार्थ का बड़ी ही  सरलता से आपने लघु कथा में रेखांकित किया ..साधुवाद आपको .सादर

Comment by Kavita Verma on August 9, 2013 at 7:06pm

prabhavi laghukatha ..

Comment by Ajitsinh Jagirdar on August 9, 2013 at 6:00pm

बहुत मार्मिक व्यंग्य ....गागर में सागर  .....कटु सत्य भी.......ये तो फिर भी रमजान में नए बाट, तराजू हैं . दिवाली पे तो खुली लूट रहती है...

Comment by Vasundhara pandey on August 9, 2013 at 3:57pm

प्रभावी लघु कथा बागी जी...सादर बधाई !

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 9, 2013 at 2:12pm

बहुत खूब बागी जी। शानदार लघुकथा। इस विधा आप निःसंदेह महारथ हासिल करते जा रहे हैं। दाद कुबूल करें।

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