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नज़्म - सिगरेट सी ज़िन्दगी

उँगलियों के बीच फँसी
सिगरेट की तरह
कब से सुलग रही है ज़िन्दगी
सैकड़ों ख्वाब हैं,
कश-दर-कश, धुआँ बनकर
भीतर पहुँच रहे हैं..
ज्यादातर का तो
दम ही घुटने लगता हैं
और भाग जाते हैं लौटती साँसों के साथ ।
पर कुछेक हैं,
जो छूट गए हैं भीतर ही कहीं
पड़े हुए हैं चिपक कर, टिककर..
इन दिनों एक-एक कर मैं
उन्हीं ख़्वाबों को
मुकम्मल करने में लगा हूँ.

मिलूँगा फिर कभी
कि अभी ज़रा जल्दी में हूँ
मेरी सिगरेट ख़त्म होने को है..


(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by विवेक मिश्र on August 19, 2013 at 8:12pm
शुक्रिया गिरिराज जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 19, 2013 at 8:07pm

लाजवाब , नज़्म !! वाह वा !! बधाई !!

Comment by विवेक मिश्र on August 15, 2013 at 9:03pm
शुक्रिया डॉक्टर साहब।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 15, 2013 at 10:39am

बेहतरीन नज्म .सादर बधाई 

Comment by विवेक मिश्र on August 14, 2013 at 11:54am
वसुन्धरा जी - नज़्म आपको पसन्द आई। दिल से आभारी हूँ।
Comment by विवेक मिश्र on August 14, 2013 at 11:53am
बाग़ी भाई - रचना में निहित भाव को समझने के लिए धन्यवाद। आपकी टिप्पणी ने रचना का मान रख लिया।
/"कहीं ओही तरे ना नु.."/ - ऐ भाई! दाल में कुछु 'पीयर' बा का जी? देखीं! हमरा के डेरवाईं जीन। :-P
Comment by Vasundhara pandey on August 14, 2013 at 8:57am

मिलूँगा फिर कभी
कि अभी ज़रा जल्दी में हूँ
मेरी सिगरेट ख़त्म होने को है.....क्या कहने....गजब...

बधाई आपको...!!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 14, 2013 at 8:54am

विवेक भाई, सच कहूँ तो आपकी यह रचना चौकाने के लिए काफी है, बहुत ही गंभीर रचना हुई है, प्रतीकों और बिम्बों का प्रयोग इस रचना की उचाई को एकदम 

बढ़ा दिया है |
रचना की अंतिम पंक्तियाँ ....
मिलूँगा फिर कभी
कि अभी ज़रा जल्दी में हूँ
मेरी सिगरेट ख़त्म होने को है..

आय हाय हाय, क्या कहने भाई, जीवन का फलसफा तीन पंक्तियों में, वाह |
बहुत बहुत बधाई इस रचना पर, ऐसी रचनायें रोज जन्म नही लिया करतीं |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 14, 2013 at 8:47am

//भाई, इलाहाबाद कब आवत बाड़ऽ.. ? सर्हियाइ के बधाई देतीं.  हा हा हा .. . //

सर्हियाइ के.……………. कही वोही तरे ना नू ,  तू आव फेनु हम बतावत बानी ;-)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 12, 2013 at 1:12pm

गुरुजी... ??? 

ई तंज कबसे मारे लगलऽ ए भाई ?  :-)))))

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