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बंजर बादल चूम रहे हैं/फिर से प्रेत शिलाएं

बंजर बादल चूम रहे हैं

फिर से प्रेत शिलाएं

लोकतंत्र की

लाश फूलती

गंध भरे

गलियारों में

यहां-वहां बस

काग मचलते

तुष्‍ट-पुष्‍ट

ज्‍योनारों में

नित्‍य बिकाउ नारे लेकर

चलती तल्‍ख हवाएं

गंगा का भी

संयम टूटा

वक्र बही

शत धारों में

क्षुब्‍ध, कुपित

पर्वत, हिमनद भी

कह गए बहुत

ईशारों में

पछताते चरणों से लौटी

कितनी विकल दुआएं

निरा अकेला

विक्रम आकर

क्‍या कर लेगा

ऐसे में

बत्‍तीसी की

सभी पुतलियां

सिमट चुकी

हम जैसे में

मूक -शिथिल है आज सभी कुछ

हंसती वैताल कथाएं

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Sumit Naithani on July 12, 2013 at 9:48am

sunder 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 12, 2013 at 9:33am

वर्तमान परिदृश्य का दृश्य खींच दिया आपने अपने शब्दों से ..हार्दिक बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 12, 2013 at 9:31am

बहुत ही सामयिक और सुन्दर प्रस्तुति आ० राजेश जी 

गंगा का भी

संयम टूटा

वक्र बही

शत धारों में

क्षुब्‍ध, कुपित

पर्वत, हिमनद भी

कह गए बहुत

ईशारों में

पछताते चरणों से लौटी

कितनी विकल दुआएं.....इस भाव पंक्ति के लिए विशेष बधाई 

सादर. 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 11, 2013 at 9:37pm

आदरणीय, सिपिया या सफ़ेदा के बाद फिर से फजली कभी रुचा है क्या ? वैसे मीठा तो फजली भी होता है..

सादर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 11, 2013 at 8:25pm

आ0 राजेश भाई जी,  वाह! अतिसुन्दर प्रस्तुति।   हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by ram shiromani pathak on July 11, 2013 at 8:24pm

आदरणीय भाई राजेश  जी बहुत मार्मिक  चित्रण किया है आपने//////हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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