For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

राजू मोबाइल से गाना सुनने में मस्त था- "वो इक लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था।"
तब तक उसके कानों में पिता जी की आवाज गूंजी- "सूरदास का पद नहीं सुन सकते थे क्या? या मीरा, तुलसी, कबीर का भजन सुनते?"
राजू डर गया और उसने गाना सुनना बंद कर दिया।
दो दिन बाद की बात है पिता जी अपने मोबाइल से गीत सुन रहे थे-"धूप में निकला न करो रूप की रानी, गोरा रंग काला न पड़ जाये।"
तब तक उनके कानों में आवाज गूँजी- "पिता जी! यह किसका पद या भजन है?"

मौलिक व अप्रकाशित
(संशोधित)

Views: 1378

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 11, 2013 at 4:46pm
आदरणीय गुरुजनवृंद ( विशेषकर आदरणीय वीनस जी को सम्बोधित ) ! //यह अस्वाभाविक है। न तो पिता अभी इतने दकियानूस हुए हैं और न ही पुत्र इतने मुँहफट हुए हैं।//
आदरणीय यह कथा बिल्कुल मेरे पड़ोस की है। और जहाँ मुझे कथा मिली वह कोई और नहीं बल्कि कथा का पात्र राजू है। उसके इसी प्रश्न पर पिता जी ने उसे चार हाथ जमा दिया था। और वह पिटा हुआ बाग में बैठा था जहाँ मैं पहुँच गया। तब उसने अपनी कथा बतायी, और मैंने उसी के शब्दों में इसे व्यक्त कर दिया।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 11, 2013 at 4:12pm

//खुबसूरत लेकिन बच्चे के मुख से ये निकलना चाहिए था ,. पिता जी ये किसके पद हैं ?//

भाई रवि जी ने संयत सटीक और सार्थक सुझाव दिया है.  हार्दिक बधाई

Comment by Rash Bihari Ravi on July 11, 2013 at 4:09pm

खुबसूरत लेकिन बच्चे के मुख से ये निकलना चाहिए था ,

पिता जी ये किसके पद हैं ?

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 11, 2013 at 4:01pm

भाई जी यह चुटकुला होता तो मैं मान भी लेता अन्य सभी ने सब कुछ कह ही दिया है.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 11, 2013 at 3:59pm

asambhav ............ye kathaa padh niraasha huee ...........


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 11, 2013 at 3:42pm

यह कथा है ? वह भी विन्ध्येश्वरी त्रिपाठी विनय जी की कलम से, निराशा हुई ! 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 11, 2013 at 3:30pm

भाईजी, यह रचना तो यहाँ प्रस्तुत हुई दीख रही है !

फिर आपने आज मुझसे इस रचना पर कैसा व्यक्तिगत सुझाव मांगा है ?  हम पूछ इस लिए रहे हैं कि जब मेरे सुझावों की प्रतीक्षा ही भारी पड़े और रचना प्रस्तुत हो जाये तो मेरे सुझावों की आवश्यकता ही क्या है ! जबकि मैंने मात्र दस मिनटों में आपके पत्र का प्रत्युत्तर दिया था ! भला होता आपने अपनी इस रचना का मात्र लिंक दे दिया होता, यह कर कि रचना प्रकाशित हो गयी है, आप टिप्पणी दें. 

अव्वल तो मैं स्वय ही समयानुसार रचनाओं पर प्रतिक्रिया देता हूँ. 

भाईजी,  मै आपके उक्त पत्र तथा अपने उत्तर को सार्वजनिक कर रहा हूँ. ..

//..निम्नलिखित रचना आपके समीक्षार्थ प्रेषित है, इसमें कौन सा पक्ष कमजोर है जहाँ परिवर्तन कर रचना को और भी बेहतर बनाया जा सकता है। कृपया अनुग्रह कर शिष्य को कृतार्थ करें।.. (आगे आपकी लघुकथा उद्धृत है) //

मेरा उत्तर --

इस रचना का कथ्य कमजोर है.

जो कुछ यह रचना कहना चाहती है वह स्पष्ट रूप से संप्रेषित नहीं हो रहा है. 

पारिवार में घनघोर रूप से व्याप्त ’पर उपदेसे कुसल बहुतेरे’ जैसी विसंगति को व्यवस्थित शब्द मिलने के स्थान पर आपकी कथा के माध्यम से पुत्र के मन में पिता के प्रति निहित विद्रुप खीझ मानों बाहर आ रही है.

जबकि होना यह चाहिये था कि ऐसी कोई खीझ रेखांकित न होती. अन्यथा यह उक्त पारिवार की नकारात्मकता को संप्रषित करेगी. फिर होगा यह कि कतिपय पाठक इसी अन्यथा आयाम को सतह पर ला कर आपकी लघुकथा को आँकने लगेंगे.  आपकी लघुकथा अपने हेतु से भटक जायेगी.

संभवतः मैं अपने कहे को सही ढंग से साझा कर पाया.

Comment by DR SHRI KRISHAN NARANG on July 11, 2013 at 12:56pm

Bahut achhi laghu katha, Vinay ji. Yadi hum apni baat par amal nahin karte to hamaare bachche kaise karenge?

Comment by वीनस केसरी on July 11, 2013 at 11:25am

कथा पात्रों के संवाद अस्वभाविक है
न आज पिता ऐसे दकियानूसी रह गये हैं न पुत्र अभी ऐसे मुंहफट हुए हैं ....

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 11, 2013 at 11:20am
आदरणीय वीनस सर जी! अस्वाभाविक?
रचना या रचना की भावभूमि, या और कुछ?

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"  आदरणीय अजय गुप्ता अजेय जी सादर, प्रथम दो चौपाइयों में आपने प्रदत्त चित्र का सुन्दर वर्णन…"
5 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर नमस्कार,  प्रदत्त  चित्र पर आपने सुन्दर चौपाइयाँ…"
6 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"दिल रुलाना नहीं कि तुझ से कहें हम ज़माना नहीं कि  तुझ से कहें । अच्छा शेर हुआ। ज़माना तो…"
6 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"वो तराना नहीं कि तुझ से कहें आशिक़ाना नहीं कि तुझ से कहें । यह शेर कहता है कि यह तराना आशिक़ाना…"
6 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"यह मेरी बेध्यानी का परिणाम है, मुझे और सतर्क रहना पड़ेगा। "
7 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"यह तो ऋचा जी की ग़ज़ल पर कहा था, यहॉं न जाने कैसे चिपक गया। आपकी ग़ज़ल अभी पढ़ी नहीं है।"
7 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"मुझे लगता है कि मूल ग़ज़ल के शेर की विवेचना यह समझने में सहायक होगी कि ऐसी कठिन ज़मीनों पर शेर कैसे…"
7 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय तिलक जी नमस्कार  बहुत बहुत आभार आपका इतनी बारीक़ी से  हर एक बात बताई आपने और बेहतर…"
7 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"कुछ भी होना नहीं कि तुझसे कहें रोना धोना नहीं कि तुझसे कहें १ मतले में जो क़ाफ़िया निर्धारित हुआ…"
9 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"ग़ज़ल में बह्र, रदीफ़, क़ाफ़िया का पालन अच्छा हुआ है। ग़म-ए-दौलत मिली है किस्मत से, ये लुटाना नहीं…"
9 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय, मैने तो आना के हिसाब से ही सब काफिया लिखे है। पूरी रचना पर टिप्पणी करते तो कुछ सीखने का…"
10 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"सच फ़साना नहीं कि तुझ से कहें ये बहाना नहीं कि तुझ से कहें। शेर का शेर के रूप में पूरा होना और एक…"
15 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service