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मैं क्या लिखूँ

कहाँ से पकड़ू

कहाँ से जोड़ू

न भाव है 

न आधार है 

अंतहीन है  सिलसिला 

गुजरता जाता है 

सब कुछ इस जहां मे

निराकार  है, निराधार है 

लालसाए हैं 

न ठिकाना है, न ठहरना है 

फैले हुये शब्दों के जंजाल 

महत्वाकांक्षाएं, मौलिकता 

सब दिखावा है 

क्या लिखूँ 

यह व्यथा की कथा है 

शब्दों का सूनापन है 

क्या लिखूँ 

न भाव हैं ... न ही आधार है .... 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Amod Kumar Srivastava on July 11, 2013 at 9:55pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय महिमा श्री जी, गीतिका वेदिका जी, मुकर्जी जी, जितेंद्र जी अपने अपने आशीर्वचन बनाए रखिएगा ..... धन्यवाद ....

Comment by MAHIMA SHREE on July 7, 2013 at 3:30pm

अंतर्द्वंद की अच्छी अभिवयक्ति .. बधाई आपको

Comment by वेदिका on July 7, 2013 at 6:26am

"क्या करूं और क्या न करूं" की स्थिति अच्छे से दर्शायी है! 

Comment by coontee mukerji on July 6, 2013 at 4:45pm

इंसान जब किंकर्तव्यमूढ़ हो जाता है तब उसके सम्मुख यहीं परिस्थिति आ जाती है . बहुत अच्छी अभिव्यक्ति की है.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 6, 2013 at 3:17pm
आदरणीय..अमोद जी, व्यथा की परिकाष्ठा बतलाती हुई रचना में, कुछ नहीं कहते हुय़े भी ब हुत कुछ स्पष्ट कर दिया "" फै लेहुयेशब्दों के जंजाल
महत्वाकांक्षाएं, मौलिकता

सब दिखावा है

क्या लिखूँ

यहव्यथा की कथा है

शब्दों का सूनापन है""......सुंदर रचना के प्रस्तुतिकरण पर हार्दिक बधाई

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