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नियमों की सरहदें

नियमों की सरहदें

 

उलझी हुई मानवीय अपेक्षाओं से अनछुआ

तुम्हारे लिए मेरा काल्पनिक अलोकित स्नेह

किसी सांचे में ढला हुआ नहीं था,

और न हीं वह पिंजरे में बंद पक्षी-सा

कभी सीमित या संकुचित था लगा।

 

एक ही वृक्ष पर बैठे हुए हम

दो उन्मुक्त पक्षिओं-से थे,

कभी तुम चली आई उड़ कर पास मेरे,

और मैं गद-गद हो उठा, और कभी मैं

हर्षोन्माद में आ बैठा डाल पर तुम्हारी।

 

शैतान हँसी की हल्की-सी फुहार लिए,

तुमने मेरे लिए अपनी आँखें बिछा दीं

और हम दोनों को लगा कि हमने

कल्पनातीत उस स्वर्णिम पल में

रिश्तों के नियमों की सरहदें लांघ ली...

 

                      -------

                                      - विजय निकोर

                                        २५ जून, २०१३

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on January 30, 2014 at 1:23pm

//ऐसे सुन्दर स्नेह भावों में पगी सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई //

आपका हार्दिक आभार, आदरणीय लक्ष्मण भाई।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 25, 2014 at 6:30pm

शैतान हँसी की हल्की-सी फुहार लिए,

तुमने मेरे लिए अपनी आँखें बिछा दीं

और हम दोनों को लगा कि हमने

कल्पनातीत उस स्वर्णिम पल में

रिश्तों के नियमों की सरहदें लांघ ली...-........पक्षियों  को प्रतिक बना कर अप्रतिम स्नेह के भाव दर्शाती रचना | जब अप्रतिम प्रेम होता है तब सरहदे नजर नहीं आती और अगर आ भी जावे तब भी प्रेमी कहाँ मानता है | ऐसे सुन्दर स्नेह भावों में पगी सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by vijay nikore on January 24, 2014 at 12:56pm

 

आदरणीय योगराज भाई, सादर प्रणाम। रचना की सराहना के लिए आपका अतीव धन्यवाद।

 

 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 15, 2014 at 2:31pm

//और हम दोनों को लगा कि हमने
कल्पनातीत उस स्वर्णिम पल में
रिश्तों के नियमों की सरहदें लांघ ली//

बहुत ही प्यारी सी खुश-फहमी है, जब कोई संवेदनशील ह्रदय किसी भी कैद या किसी भी सरहद को माने से इंकार कर देती है तो इसी तरह की भावनाएं जन्म लिया करती हैं. बहुत खूब आ० विजय निकोर जी.

Comment by vijay nikore on November 21, 2013 at 5:38pm

आदरणीया प्रिय़ंका जी:

 

इस रचना को "Like" में संजो रखने के लिए आपका हार्दिक आभार।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on July 11, 2013 at 9:51pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय अशोक जी।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 10, 2013 at 8:08pm

बहुत सुन्दर भावुक करती रचना.आदरणीय विजय निकोर साहब सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by vijay nikore on July 5, 2013 at 3:30pm

आदरणीय बसंत जी:

 

इस कविता को आपने सराहा, मेरा लेखन सार्थक हुआ। मैं आपका आभारी हूँ।

 

सादर,

विजय निकोर

 

Comment by vijay nikore on July 5, 2013 at 3:27pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई:

 

// ..... आपकी रचना में परिलक्षित करने में आप सफल हुए हैं //

 

रचना को आपसे अनुमोदन मिला, आपका हार्दिक आभार, आदरणीय।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on July 5, 2013 at 3:23pm

आदरणीया प्रियंका जी:

 

कविता की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ।

 

सादर,

विजय निकोर

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