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तू  मुझमें  बहती  रही, लिये धरा-नभ-रंग
मैं    उन्मादी   मूढ़वत,   रहा  ढूँढता  संग

सहज हुआ अद्वैत पल,  लहर  पाट  आबद्ध
एकाकीपन साँझ का, नभ-तन-घन पर मुग्ध

होंठ पुलक जब छू रहे,   रतनारे   दृग-कोर
उसको उससे ले गयी,  हाथ पकड़ कर भोर

अंग-अंग  मोती  सजल,  मेरे तन पुखराज
आभूषण बन  छेड़ दें, मिल रुनगुन के साज

संयम त्यागा स्वार्थवश,  अब  दीखे  लाचार
उग्र  हुई  चेतावनी,  बूझ  नियति  व्यवहार

*******************************

--सौरभ

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on June 24, 2013 at 9:29pm

अत्यंत उच्चकोटि के सुंदर दोहे रचे हैं आदरणीय आपने! शब्द चयन, भाव, कथ्य, शिल्प के गठजोड़ का अनूठा उदाहरण हैं ये दोहे! आपका बहुत आभार कि आपने इन्हें इस मंच पर हम लोगों से साझा किया।
सादर!

Comment by Savitri Rathore on June 24, 2013 at 7:45pm

तू  मुझमें  बहती  रही, लिये धरा-नभ-रंग
मैं    उन्मादी   मूढ़वत,   रहा  ढूँढता  संग
अत्यंत मर्मस्पर्शी दोहावली ......सुन्दर शब्द-चयन ...........आदरणीय सौरभ जी,बहुत -बहुत बधाई !

Comment by अरुन 'अनन्त' on June 24, 2013 at 10:54am

अहा ! अत्यंत सुन्दर मनोहारी हृदयस्पर्शी दोहे आदरणीय गुरुदेव श्री. ह्रदय से भूरि भूरि बधाई स्वीकारें आदरणीय गुरुदेव श्री.

उत्तम दोहों के लिए, आह कहूँ या वाह ।

पढ़ता बारम्बार हूँ, लेकिन मिटे न चाह ।।

Comment by वीनस केसरी on June 24, 2013 at 9:40am

वाह सुन्दर दोहावली 

संयम त्यागा स्वार्थवश,  अब  दीखे  लाचार

उग्र  हुई  चेतावनी,  बूझ  नियति  व्यवहार


सामयिकता का पुट भी पसंद आया ...
Comment by shalini rastogi on June 23, 2013 at 5:06pm

तू  मुझमें  बहती  रही, लिये धरा-नभ-रंग...

वाह ..... पहले दोहे की प्रथम पंक्ति ही रस विभोर कर गयी .. तत्पश्चात तो एक एक दोह पढते रहे और आनंद सागर में डुबकियां लगते रहे .. अद्भुत .. प्रत्येक दोहा अपने आप में अनमोल है .. हार्दिक बधाई महोदय !

Comment by mrs manjari pandey on June 23, 2013 at 4:22pm

आदरणीय सौरभ जी, 

      आप यूँ ही लिखते रहें रंग भरे नवरंग  
      हम पढ़ के हो जायेंगे आप भरे रस रंग .
Comment by ram shiromani pathak on June 23, 2013 at 12:43pm

अंग-अंग  मोती  सजल,  मेरे तन पुखराज 
आभूषण बन  छेड़ दें, मिल रुनगुन के साज ///////////अद्भुत अद्भुत 

वाह वाह आदरणीय  सौरभ जी बहुत ही  सुन्दर दोहा लिखा है अपने ///प्रणाम सहित हार्दिक बधाई 

Comment by वेदिका on June 22, 2013 at 5:56pm

एक एक दोहा … भावों से भरा हुआ 

संयम त्यागा स्वार्थवश,  अब  दीखे  लाचार
उग्र  हुई  चेतावनी,  बूझ  नियति  व्यवहार … सही कहा आपने आदरणीय, अब नियति को स्वीकारना ही होगा  

Comment by Shyam Narain Verma on June 22, 2013 at 12:41pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ..................

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 22, 2013 at 10:39am

आदरणीय सौरभ जी!   एक- एक पद मणि सम अनमोल ,किसी एक की क्या बात करूँ 

पहले और अंतिम दोहे ने मानव और  नियति के  सारे स्वरुप की गाथा  खोल के रख दी 
नियति हमारे स्वार्थ की कथा ही तो बांच रही है आजकल गिन गिन के हिसाब ले रही है 
इन अनुपम उत्कृष्ट दोहों के लिए आपकी लेखनी को नमन  

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