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इन नदियों की पीठ पर लहरें /जाने क्‍या-क्‍या लिखती है

इन नदियों की पीठ पर लहरें

जाने क्‍या-क्‍या लिखती है

 

मतपत्रों से

रिसते वादे

निठुर वंचना

हेठ इरादे

नारों की

नीली पगडंडी

और पुनर्मिलन

के वादे

या फिर

मत देने से पहले

पाई कालिख लिखती है

 

इन नदियों ...............

 

नित्‍य पथिक जो

बने पर्यटक

कहां फिरे

उस राह आजतक

और सुलगते

खेतों में जब

उगी फसल

कुछ हिंस्‍त्र दूर तक

संगीनों की वही कहानी

रोज नहीं क्‍या लिखती है ?

 

इन नदियों ...............

 

खटे मेघ

जी भर के फिर से

इन उजड़े

वीरानों में

देखें अबके

क्‍या मिलता है

लुटे-पिटे अरमानों में

ध्‍यान मग्‍न यह

धारा भी तो

कीर्तन सा कुछ लिखती है

 

इन नदियों ...............

 

(पूर्णत: मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by ajay sharma on November 28, 2013 at 9:54pm

kuch na kah sakne ki istithi ......nih-shabdh ...sirf apki soch ki gahrai ko naman  kar sakta hoo........


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 3, 2013 at 11:06pm

इस रचना पर निश्शब्द हूँ आदरणीय राजेश कुमार झा जी. . विलम्ब से आने के लिए क्षमा.. .

अपने ऊँचे भाव, सटीक शब्द चयन और प्रबुद्ध शिल्प से यह रचना मोह लेती है.

विसंगतियों का दर्द उभर कर आया है. 

सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on June 20, 2013 at 5:05pm

आप सबका हार्दिक आभार

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 20, 2013 at 3:05pm

वाकई सुंदर ...पढने में भी आनंद आया ..बंधी हुई रचना ..और ब्रिजेश जी से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ 

Comment by बृजेश नीरज on June 19, 2013 at 11:00pm

अति सुंदर! बाकी तो वीनस जी ने कह ही दिया तो दोहराने से क्या लाभ! उसे मेरा लिखा भी मानें।
आपको हार्दिक बधाई!

Comment by ram shiromani pathak on June 19, 2013 at 10:01pm

आदरणीय राजेश जी//सुन्दर नवगीत।...बधाई 

Comment by राजेश 'मृदु' on June 19, 2013 at 6:14pm

आप सबका हार्दिक आभार, स्‍नेह बनाए रखें, सादर

Comment by वीनस केसरी on June 19, 2013 at 10:09am

वाह भाई जी आनंदमाय हो गया ...
किसी सधी हुई रचना है ...

ऐसी उत्तम रचनाएँ कम ही देखने पढ़ने को मिलाती हैं ...
सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on June 18, 2013 at 2:28pm

अतिसुन्दर  प्रस्तुति।   हार्दिक बधाई स्वीकारें।  

Comment by विजय मिश्र on June 18, 2013 at 2:24pm
आज के इस लुटे-पीटे वातावरण पर जबरदस्त कटाक्ष . बहुत सुंदर लिखा राजेशजी .

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