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बारिशो के 

मौसम में 
मन जब 
चाहे किसी के 
साथ दूर तक 
ठहल आने को 
मेरा ख्याल तो 
नहीं आता न 
तुम को 
किसी अंजान
शहर में 
घूमते हुए 
नजरें जब 
किसी अजनबी 
चेहरे में 
तलाशने लगे 
किसी खास 
शख्स को 
मेरा ख्याल तो 
नहीं आता न 
तुम को 
या फिर 
निपट अकेलेपन में 
चाह हो 
किसी कंधे की 
किसी स्पर्श की 
दिल खोल के रखने को 
जी चाहे जब 
मैं जानती हूँ 
फिर भी 
जाने क्यूँ 
होता है ये यकीं 
तुम्हारे ख्यालो में 
मैं भी कहीं तो 
महकती होंगी न.... 

मौलिक एंव अप्रकाशित 

Views: 902

Comment

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Comment by दिव्या on June 7, 2013 at 11:38am

आदरणीय राम शिरोमणि पाठक जी, 
आगे कमियों को दूर करने का प्रयास करुँगी | आप का ह्रदय से आभार

Comment by दिव्या on June 7, 2013 at 11:35am

आदरणीय Jitendra Pastariya जी, 

आप की सरहना ओर शुभकामनाओं के लिए आप का ह्रदय से आभार 

Comment by दिव्या on June 7, 2013 at 11:33am

आदरणीय संदीप जी, 

मैं जानती हूँ 
फिर भी 
जाने क्यूँ 
होता है ये यकीं 
तुम्हारे ख्यालो में 
मैं भी कहीं तो 
महकती होंगी न....  सीधा सा अर्थ है कि मैं जानती हूँ ऐसा मुमकिन नहीं मगर दिल को लगता है कि उनके ख्यालो में मैं भी कहीं तो रहती होंगी 
वर्तनी दोष कि ओर ध्यान दिलाने के लिए आप का आभार आगे से इस कमी को दूर करने का प्रयास करुँगी | 
ये मेरे ही लिखे का दोष है जिसमे भावनाये स्पष्ट नहीं हो पा रही है  क्षमा मांग के शर्मिंदा मत कीजिये 

Comment by बृजेश नीरज on June 6, 2013 at 10:57pm

आदरणीया इस रचना को इस तरह लिखने में क्या परेशानी थी?

बारिशो के मौसम में 

मन जब चाहे

किसी के साथ

दूर तक ठहल आने को 

मेरा ख्याल तो नहीं आता न 

तुम को !

 

किसी अंजान शहर में 

घूमते हुए नजरें जब 

किसी अजनबी चेहरे में 

तलाशने लगे 

किसी खास शख्स को 

मेरा ख्याल तो नहीं आता न 

तुम को !

 

इस अंतिम बंद में कलम बहक सी गयी लगती है। कथ्य स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। इसे एक बार फिर से देखकर संयमित कर लें।

 

या फिर 

निपट अकेलेपन में 

चाह हो किसी कंधे की 

किसी स्पर्श की 

दिल खोल के रखने को 

जी चाहे जब 

मैं जानती हूँ 

फिर भी जाने क्यूँ 

होता है ये यकीं 

तुम्हारे ख्यालो में 

मैं भी कहीं तो 

महकती होंगी न.... 

 

अतुकांत को जितने सधे ढंग से आप लिखने का प्रयास करेंगी रचना की सुंदरता उतनी ही बढ़ेगी, भाव उतने ही स्पष्ट होंगे।

नामचीन कवियों की रचनायें पढ़ें। आदरणीय सौरभ जी के अतुकांत जो यहां ओबीओ पर ही पोस्ट हैं उन्हें देखें। आपको रास्ता मिलेगा।

 

आपने उम्मीद है इसलिए साहस कर इतना कह दिया। आशा है आप इसे अन्यथा न लेंगी और मेरे इस दुस्साहस को क्षमा करेंगी।

आपके इस प्रयास पर आपको हार्दिक बधाई।

सादर!

Comment by Shyam Narain Verma on June 6, 2013 at 5:55pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by Pragya Srivastava on June 6, 2013 at 5:54pm

अति सुंदर

Comment by vijay nikore on June 6, 2013 at 12:40pm

रचना में भावनाएँ अच्छी लगीं। बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by विजय मिश्र on June 6, 2013 at 10:16am
सहज ही सुंदर और मीठी उलाहना के साथ एक अपेक्षा भी .साधुबाद दिव्याजी
Comment by रविकर on June 6, 2013 at 9:00am

बहुत खूब आदरेया-

सीधे साधे प्रश्न से, टहलाते मनमीत |
प्रेम प्रेम सदप्रेम ये, पग पग जाए जीत ||


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 6, 2013 at 8:10am

आपके रचनाकर्म में संभावनाएँ हैं, दिव्याजी. शुभेच्छाएँ .

कृपया ध्यान दे...

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