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पहला प्रयास है ,निसंकोच समझा दीजिए 

धरती के चिथड़े हुए ,जल बिन सब बेजान |
खाली बर्तन ले सभी ,भटक रहे इन्सान ||

गर्मी से सूखा बढ़ा , जल की हाहाकार |
अफरा तफरी है मची ,प्यासे है नर नार ||

ताल भये सूखे सभी, पारा बढता जाय |
खाली गागर ले फिरे, पानी नजर न आय ||

मिनरल वाटर कंपनी ,धार रूप विकराल |
पानी सारा ले उडी ,जन जन है बेहाल ||

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by वेदिका on June 7, 2013 at 4:06pm

जल बिन कैसे कल पड़े, जल बिन कल का होय 

आज बचाए नीर ना , कल सूखे को रोय ....!
सुंदर और सार्थक झमा झम  दोहे ...बधाई सरिता जी 
Comment by aman kumar on June 7, 2013 at 3:56pm

आपके दोहे पडकर इंद्र भगवान  प्रसन्न हो गए , वर्षा हो गयी है 

अति सुंदर ! आभार 
Comment by Sarita Bhatia on June 6, 2013 at 10:56pm

आदरणीय अशोक कुमार raktale जी आपने सुंदर दोहा रच कर उत्साह बढाया है आभार 

Comment by Sarita Bhatia on June 6, 2013 at 10:55pm
अरुण निगम sir ,आदरणीय सौरभ जी उत्साह वर्धन के लिए आभारी हूँ ,स्नेह बनाए रखें
Comment by Sarita Bhatia on June 6, 2013 at 10:51pm

संदीप कुमार पटेल जी शुभाशीष 

Comment by Ashok Kumar Raktale on June 6, 2013 at 9:09am

चारों दोहे छंद सुन, ताप न आवे पास |

बादल नभ पर हैं घिरे, अब वर्षा की आस ||

आदरणीया सरिता जी बहुत सुन्दर दोहे रचे हैं सादर बधाई स्वीकारें.छंद कर्म पर निरंतरता बनाए रखें. सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 31, 2013 at 9:44pm

पाठक सस्वर बाँचते,  चारों  दोहा  छंद

घोर ग्रीष्म साझा करें, सरिताजी के बंद

हृदय से बधाई स्वीकारें, आदरणीया.. .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on May 31, 2013 at 9:13pm

सफल प्रयास हेतु शुभ-कामनायें........निर्दोष दोहे......

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 31, 2013 at 11:49am

बहुत ही सुंदर दोहे रचे हैं आदरणीया आपने सदर बधाई स्वीकरें 

Comment by Sarita Bhatia on May 31, 2013 at 11:37am

सभी आदरणीय जनों का हार्दिक आभार मेरा उत्साहवर्धन करने के लिए ,post करते हुए डर रही थी ,यहाँ बहुत गुणीजन बैठे हैं पता नहीं कैसी प्रतिक्रिया आएगी परन्तु सब ने जो उत्साह बढाया है आगे कुछ भी रचना post करने में मेरा आत्मिक बल बढाएगा और मेरी लेखनी को प्रबल करने में सक्षम होगा ,तह दिल से सभी का शुक्रिया ,मार्गदर्शन करते रहें 

सादर 

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