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उद्विग्न चित्त
पहचान है
असिद्ध बुद्धि की।
आता कहाँ उबाल
सिद्ध दल में
बटलोई की।
स्वरूप में ही
स्थिति होना
है स्वस्थ होना।
निज मान,अपमान
आनन्द की चाबी
औरों के हाथ
क्या देना।
चिरानन्द है
'स्वयं' में
बस है पहचानना।
-विन्दु
(मौलिक,अप्रकाशित)

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Comment by Vindu Babu on April 28, 2013 at 3:49pm
आदरणीय कुशवाहा महोदय आपको मेरा हृदयातल से सादर आभार।
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 26, 2013 at 2:31pm

चिरानन्द है
'स्वयं' में
बस है पहचानना।

यही वास्तविक ज्ञान है. 

सुन्दर अभिव्यक्ति हेतु सादर बधाई स्वीकारें, आदरणीया वन्दना जी , सादर 

Comment by Vindu Babu on April 18, 2013 at 10:55am
आदरणीय रक्ताले महोदय आपने रचना पर अपनी प्रतिक्रिया देकर रचना का महत्व बढाया है।
आपका बहुत आभार
सादर
Comment by Ashok Kumar Raktale on April 18, 2013 at 8:11am

आदरणीया वन्दना तिवारी जी सादर, सही है आनंद की अनुभूति हमारे अंतर्मन से ही आती है. फिर कहीं ओर खोजने की क्या आवश्यकता. सुन्दर रचना बधाई स्वीकारें.

Comment by Vindu Babu on April 18, 2013 at 7:46am
आदरणीय केवल प्रसाद जी आप की टिप्पणी हमारा उत्साहवर्धन करती है।
सादर आभार।
Comment by Vindu Babu on April 18, 2013 at 7:44am
सन्दीप पटेल जी रचना की सराहना कर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत आभार।
Comment by Vindu Babu on April 18, 2013 at 7:41am
आदरणीय रामशिरोमणि जी आपने रचना का अवलोकन किया इसके लिए आपका सादर धन्यवाद।
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 17, 2013 at 6:26pm

आदरणीया वंदना तिवारी जी,
'चिरानन्द है
’स्वयं’ में
बस है पहचानना।’ अतिसुन्दर रचना । बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 17, 2013 at 5:16pm
आनन्द की चाबी
औरों के हाथ
क्या देना।
चिरानन्द है
'स्वयं' में
बस है पहचानना।

बहुत सुन्दर बात बताई आपने इस रचना के माध्यम से आदरणीया सादर बधाई स्वीकारें
Comment by ram shiromani pathak on April 17, 2013 at 12:11pm

निज मान,अपमान
आनन्द की चाबी
औरों के हाथ
क्या देना।
चिरानन्द है
'स्वयं' में
बस है पहचानना।////////आदरणीया वन्दना जी सही कहा आपने सुन्दर कथ्य  !हार्दिक बधाई 

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