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                 अंतिम स्पंदन

   यदि मैं अर्पित करता भी स्नेह

   उमड़ता रहा है जो मन में मेरे

   क्षण-अनुक्षण तुम्हारे लिए,

   कोई अंतरित ध्वनि कह देती है..कि

   स्नेह  इतना  तुम  सह  ही  न  सकती,

   और फिर द्वार तुम्हारे से लौट आए

   अस्वीकृत स्नेह का बींधता क्रंदन...

   मैं ही स्वयं उसको सह न सकता।

   अबोध बालक-सा सकुचाता, बिलखता,

   यह सशंक स्नेह अंतहीन वेदना संजोए

   तुमको निष्फल पुकार-पुकार कर,

   पत्थर-दिल चट्टानों से टकरा-टकरा कर

   किस-किस बादल की ओट में  बरसता?

   मेरे ह्रद्य की धड़कन जब शिथिल पड़ जाए

   तो इस अस्वीकृत अनुरक्त स्नेह को प्रिय

   तुम झुकी हुई पलकों से कुछ पल के लिए

   अपने अंतरमन के प्राणों में आश्रय दे देना,

   और ऐसे में यदि हो जाएँ झंक्रत तार तुम्हारे,

   अपने ओंठों के स्निग्ध स्पर्ष के स्पंदन से

   अथवा आँखो से बहते अंजन से तुम मुझको

   रात के सन्नाटे में  स्वयं अलविदा कह देना।

                        --------

                                         -- विजय निकोर

 

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Savitri Rathore on April 7, 2013 at 12:01am

आदरणीय विजय जी,सादर प्रणाम!
आपकी 'अंतिम स्पंदन' कविता आज लम्बे समय के बाद पढ़ी।अत्यंत मर्मस्पर्शी रचना .....बधाई हो।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 6, 2013 at 9:29pm

आदरणीय विजय निकोर जी इस रचना ने तो अंतर उर तक ग़मगीन कर दिया बहुत मार्मिक बस क्या कहूँ कुछ शब्द ही नहीं मिल रहे हैं शुभकामनायें 

Comment by vijay nikore on April 6, 2013 at 4:43am

आदरणीय राजेश कुमार जी:

 

आपने इस रचना के भावों को अपनी प्रतिक्रिया से और जीवंत किया है।

मेरा हार्दिक धन्यवाद।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on April 6, 2013 at 4:39am

 

आदरणीय लक्ष्मण जी:

सराहना से मनोबल बढ़ाने के लिए हार्दिक आभार।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by बृजेश नीरज on April 5, 2013 at 10:51pm

अस्वीकृत स्नेह को स्वीकार कर लिए जाने की चाह अंत तक बनी रहती है। इस चाह को जिस खूबसूरती से आपने उकेरा है वह आप ही कर सकते हैं। अप्रतिम! बधाई स्वीकारें।

Comment by shalini kaushik on April 5, 2013 at 10:43pm
भावात्मक अभिव्यक्ति ह्रदय को छू गयी
Comment by Ashok Kumar Raktale on April 5, 2013 at 10:25pm

आदरणीय विजय निकोर साहब सादर, बहुत ही हृदयस्पर्शी भावपूर्ण प्रस्तुति.वाह! हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by seema agrawal on April 5, 2013 at 10:10pm

मन को झकझोरती हुए एक और हृदयस्पर्शी प्रस्तुति .....विजय जी आपकी रचनाएँ एक विशेष भाव दशा को बहुत सशक्त तरीके से अभिव्यक्त करती रहीं हैं उसी कड़ी में इस प्रस्तुति को भी सराहना देती हूँ ...शुभकामनाएं 

Comment by ram shiromani pathak on April 5, 2013 at 9:43pm

आदरणीय,  श्री विजय निकोर जी,सुन्दरतम अभिव्यक्ति............हार्दिक बधाई स्वीकारे  

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 5, 2013 at 9:28pm

आदरणीय,  श्री विजय निकोर जी,   आपने एक असहाय और प्रेम समर्पित व्यक्ति की मनोदशा का चित्रण बड़ी ही संजीदगी किया- -‘अबोध बालक.सा सकुचाता, बिलखता,
यह सशंक स्नेह अंतहीन वेदना संजोए‘.. बहुत सुन्दर झांकी। बहुत-बहुत बधाई स्वीकार करें। सादर,

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