For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

बाल्टी भर पसीने की अमर कहानी

बढ़ते तापमान और दिनों-दिन घटते जल स्तर से भले ही सरकार चिंतित न हो, मगर मुझ जैसे गरीब को जरूर चिंता में डाल दिया है। सरकार के बड़े-बड़े नुमाइंदें के लिए मिनरल वाटर है और कमरों में ठंडकता के लिए एयरकंडीषनर की सुविधा। ऐसे में उन जैसों के माथे पर पसीने की बूंद की क्या जरूरत है, इसके लिए गरीबों को कोटा जो मिला हुआ है। पसीने बहाने की जवाबदारी गरीबों के पास है, क्योंकि यही तो हैं, जिनके पास ऐसे संसाधन नहीं होते या फिर उन जैसे नुमाइंदों को फिक्र नहीं होती कि खुद की तरह तो नहीं, पर इतना जरूर सुविधा दे दे, जिससे गरीबों का खून ना सूखे। बड़े लोगों के लिए तमाम तरह की सुविधा किसी से छुपी नहीं है, लेकिन हम गरीबों को मिलने वाली सुविधा छिपाई तो नहीं जाती, वरन् हड़प जरूर ली जाती है। इन्हीं बातों को लेकर कुछ लिखने के लिए मैं बैठा था, इसी दौरान मुझे आंख लग गई और मैं गहरी सोच में डूब गया।
मैं अपने गांव के मोहल्लों में तफरीह के लिए निकला, वहां मैंने देखा कि गांव के का एक व्यक्ति पसीने से तर-बतर है। हैण्डपंप से वह पानी लेने के लिए बहुत समय से नल के मुंह पर बाल्टी लगा रखा है और वह हैण्डपंप का, हैण्डल मार-मारकर थक गया है। उसके पहने हुए कपड़े पसीने से भीगे पड़े हैं और दूसरी ओर हैण्डल के पास रखी, दूसरी बाल्टी पसीने से भर रही है। वह हैण्डल पर हैण्डल, दिए जा रहा है, मगर हैण्डपंप है कि पानी ही नहीं उगल रहा है। मैंने पास जाकर उस व्यक्ति से पूछा, क्यों भाई, हैण्डपंप में तो पानी नहीं निकल रहा है, उल्टे तुम्हारे पसीने से दूसरी बाल्टी भर गई है। इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि क्या करें भाई, गांव में गर्मी के कारण हैण्डपंप के हलक सूखे पड़े हैं। इसलिए कोषिष कर रहे हैं कि कैसे भी हैण्डपंप से पानी निकल आए, क्योंकि प्यास से कोई बड़ी चीज थोड़ी ना है। इसके बाद मैंने उससे पूछा कि हैण्डपंप से पानी के बजाय, बाल्टी पसीने से भर गई है, इसकी तुम्हें चिंता नहीं है ? इस पर उस व्यक्ति ने जवाब देते हुए जो कहा, उससे मेरे कान खड़े हो गए, हम तो गरीब हैं, भैया और गरीबों का सुनने वाला कौन है ? भला गरीबों का हमदर्द कोई होता है, क्या।
उसने कहा कि यह कोई इसी साल की समस्या नहीं है, पिछले कई दषकों से हम तो ऐसे ही जी रहे हैं और हर बरस ऐसे ही हम जैसों का पसीना बहता है। गांव-गांव में कभी-कभार बड़े लोग आकर गर्मी मंे पानी की कोई कमी नहीं होने की तसल्ली दे जाते हैं, लेकिन हालात वही है, जैसे बरसों पहले थे। हमने भी इसे अपने कर्म का लेखा मान लिया है औेर जैसी बन पड़ रही है, वैसी जिंदगी जी रहे हैं। उसने कहा कि हम तो गंवार और गरीब हैं, भला हम जैसे लोगों को पानी की इतनी ज्यादा जरूरत, किस बात की है। जरूरत तो पानी पीने वाले उद्योगों को है, सरकार भी उन पर मेहरबान है। नदी-नालों में कल-कल कर बहता पानी पर, हम जैसे गरीबों का कोई हक हो सकता है ? हम तो इसी बात से मन को मसोसकर रख लेते हैं कि बड़े लोगों का जीना, जीना है और पानी पीने का हक भी उन्हें है, हम जैसे गरीबों के लिए हवा जो है, जिस पर ऐसे कारिंदों का कुछ नहीं चलता। हालांकि इस बात को लेकर भी हव चिंतित हैं कि जो हवा हमें मिली हुई है, उस पर भी अब उद्योगों के प्रदूषण का जहर घुल रहा है, उस पर भी अब उद्योगों के प्रदूषण का जहर घुल रहा है। इस तरह मैं तो सोच-सोचकर घबरा जा रहा हूं कि क्या हम जैसे गरीबों के बाल्टी-बाल्टी भर पसीने इसी तरह ऐसे ही बहते रहेंगे ?
बाद में अचानक मैं जागा तो देखा कि मैं भी पसीने से तर-बतर हूं, क्योंकि बिजली जो चली गई थी। फिर मैं यही सोचकर मुस्कुराता रह गया कि बरसों से गरीबों के पसीने बहाने की अमर कहानी ऐसी ही चल रही है और यह तो गरीबों को होने वाली तकलीफों का एक छोटा सा हिस्सा ही है।

राजकुमार साहू, जांजगीर, छत्तीसगढ़
लेखक व्यंग्य लिखते हैं

Views: 342

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 6, 2010 at 10:00am
आम आदमी और सामाजिक सरोकार से जुडे व्यंगात्मक लेख आप बाखूबी लिख लेते है | अच्छा लेख है , बधाई |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
9 hours ago
amita tiwari posted a blog post

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
22 hours ago
vijay nikore commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।"
yesterday
vijay nikore posted a blog post

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता…See More
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service