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आकाश के उस कोने मे जहाँ मेरी दृष्टि की सीमा है….
देखता हूँ किसी ना किसी पक्षी को नित्य ही ….
क्या यह मेरा अरमान है ?
एकाकी ही दूर तक उड़ते जाना.. सत्य की खोज मे….
क्या यह मेरे मन का भटकाव है ?

कभी उत्साह की बरसात होती है…
आशाओं का सवेरा
मन के अंधेरे को झीना कर जाता है…..
और तब दिखते हो तुम मुझे,
आनंद मे नहाए एकदम तरोताज़ा
सूरजमुखी का एक फूल…
यह नही है कोई भ्रम या भूल.

वर्जनाओं के कड़े पहरे मे
जब दीवाले कुछ मोटी होजाती है…
घर-बाहर
मन की दुनिया थोड़ी छोटी हो जाती है….
तब ना जाने क्यों
हो जाता है एक विस्फोट…
एक मुखर क्रांति -एक प्रचंड…कविता
अचानक अस्तित्व मे आ जाती है

सपने टूटते नही….
कोई महा नायक उन्हे आकर सजा लेता है
अरमानो को एक नया मज़ा देता है…..
और सीमा हीन मेरा मन
एक छोटा सा निष्पाप शिशु बन जाता है….
हँसता ,खेलता, मचलता, रूठता……
अठखेलियाँ करता…..

हे विराट !
शिशु हो तुम ?
या महानायक…..
या आनंद मे डूबे, सूरजमुखी के फूल ?
या मेरे मन के विद्रोह ?
या व्योम के रेगिस्तान मे,बिना थके……
आनंद की मृगतृष्णा मे
भटक रहे मेरे मन- बिहंग ?

क्यों छिप रहे हो …ओ मौन!
बताओ तो सही….
तुम हो कौन ?

Inspired from the bangla poem of my online daughter Sreshtha.sre... you can say it is the expansion of thoughts of her poem
डॉ.ब्रिजेश कुमार त्रिपाठी

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 29, 2010 at 10:34am
वर्जनाओं के कड़े पहरे मे
जब दीवाले कुछ मोटी होजाती है…
घर-बाहर
मन की दुनिया थोड़ी छोटी हो जाती है….
तब ना जाने क्यों
हो जाता है एक विस्फोट…
एक मुखर क्रांति -एक प्रचंड…कविता
अचानक अस्तित्व मे आ जाती है,

यथार्थ से परिपूर्ण अभिव्यक्ति, बहुत ही सराहनीय कविता, श्रेष्ठा श्री को भी बधाई, कुछ तो रहा होगा आप की रचना मे जिससे डॉ साहब प्रेरित हुये |

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