For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

शांति 
------
पक्षियों का कलरव 

जल प्रपात 

समुद्र की गोद में 
क्रीड़ारत लहरें 
धुआं उगलते कारखाने 
फर्राटा  भरती  गाड़ियाँ 
शोर हर तरफ 
घुटता दम 
इसके बीच हम 
नहीं सुनायी देती 
नही दिखती 
अबला की चीत्कार 
भूखे नंगे सिसकते बच्चे 
नफरत की चिंगारी 
झुलसते तन 
लाशों का ढेर 
मानवता का टूटता दम 
कैसे सुने 
कैसे दिखे 
वक्त नही 
भौतिक  वाद 
आधुनिकीकरण 
लिप्सा 
आगे जो  है बढ़ना 
रह न जाएँ पीछे 
पड़े लाशों पे गुजरना 
शान्ति 
बड़ी कठिन है 
खोजो 
मिल भी गयी 
कष्टकारी होगी  
इन आवाजों को 
सहन कर पायेगी ?
खुलते आँख जब 
सब दिखने लगेगा 
जन्मते बिचारी 
दम तोड़ जायेगी 
इससे अशांति भली 
हत्या का दोष 
मैं क्यों लूं 
 
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा 
२५-११-२०१२ 

Views: 488

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 27, 2012 at 11:52am

आदरणीया राजेश कुमारी जी 

सादर 

आभार. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 27, 2012 at 11:49am

आदरणीया प्राची जी, सादर 

चलिए किसी का मन प्रसन्न हुआ. प्रयास सफल. वर्ना मैं तो तरसता हि रहता हूँ. रचना की गुणवत्ता जानने के लिए. 

आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 27, 2012 at 11:47am

आदरणीय लड़ी वाला जी, सादर 

साथ चलते रहिये, अंगुली पकड़ मैं भी चल लूँगा.

आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 27, 2012 at 11:46am

आदरणीय चंद्रेश जी, सादर 

आभार प्रोत्साहन हेतु.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 27, 2012 at 11:44am

आदरणीय अशोक जी, सादर 

पता नहीं जो कहना छाहता हूँ कह पाया या नहीं. 

आभार स्नेह हेतु. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 26, 2012 at 8:05pm

आधुनिकरण  की अंधी दौड़ ,दूषित पर्यावरण सांस लेना भी दूभर अशांत मन इंसान जिए तो कैसे आपकी रचना में उभरते भाव सब समझा रहे हैं बहुत अच्छी समसामयिक रचना बहुत बहुत बधाई प्रदीप कुशवाह जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 26, 2012 at 12:37pm

कोलाहल में फंसा मन, सोचने समझने की  क्षमता को खोता , लिप्साग्रस्त एक अंधी दौड़ में दौड़ता जाता... शांति मिलना मुश्किल है, अगर मिल भी गयी तो बरकरार कैसे रहेगी, ...और अंत तो वाह!!!.... हत्या का दोष मैं क्यों लूं .   

हार्दिक बधाई इस अभिव्यक्ति पर, मन खुश हो गया ये रचना पढ़ कर. सादर.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 26, 2012 at 10:18am

नहीं सुनायी देती 
नही दिखती 
अबला की चीत्कार 
भूखे नंगे सिसकते बच्चे 
नफरत की चिंगारी 
झुलसते तन 
लाशों का ढेर - बहुत सुन्दर श्री प्रदीप कुमर सिंह कुशवाहा जी, हाँ हम एक ही विश्ववद्यालय के लगते है 
पर उसके कुलपति तो श्रद्धेय सुमित्रा नंदन पन्त जैसे कड़ी बोली के महा कवी ही रहे होंगे । बधाई 
Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 25, 2012 at 11:55pm

बहुत खूब प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा जी,

कैसे सुने 

कैसे दिखे 
वक्त नही 
भौतिक  वाद 
आधुनिकीकरण 
लिप्सा 
आगे जो  है बढ़ना 
क्या बात है |
Comment by Ashok Kumar Raktale on November 25, 2012 at 8:21pm

आदरणीय प्रदीप जी 

                    सादर, बहुत सुन्दर भाव व्यक्त करती रचना के लिए बधाई स्वीकारें. सच है हम भागती दौडती जींदगी में मानवता को कहीं पीछे छोड़ आये हैं. सादर.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Saturday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Saturday
जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Aug 10
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service