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मुझे ऐसे न खामोश करें

 

 

आज मुंह खोलूंगी मुझे ऐसे न खामोश करें ,
मैं भी इन्सान हूँ मुझे ऐसे न खामोश करें !

तेरे हर जुल्म को रखा है छिपाकर दिल में ,
फट न जाये ये दिल कुछ तो आप होश करें !

मुझे बहलायें नहीं गजरे और कजरे से ,
रूमानी बातों से न यूँ मुझे मदहोश करें !

मेरी हर इल्तिजा आपको फ़िज़ूल लगी ,
है गुज़ारिश कि आज इनकी तरफ गोश करें !

मेरे वज़ूद  पर ऊँगली न उठाओ 'नूतन' ,

खून का कतरा -कतरा यूँ न मेरा नोश करो !

                                  शिखा कौशिक 'नूतन'


शब्दार्थ-

गोश-श्रवण इन्द्रिय ,कान

   नोश-पीना 

Views: 360

Comment

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Comment by shikha kaushik on November 22, 2012 at 10:59pm

उचित मार्गदर्शन हेतु हार्दिक आभार .

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on November 20, 2012 at 2:13am

अच्छा प्रयास है शिखा जी,जैसा कि भाई वीनस जी ने कहा.. कुछ मूलभूत नियमों और बातों को आत्मसात करें तो रचना ग़ज़ल होने के और भी नज़दीक हो जाएगी..! साभार,

Comment by वीनस केसरी on November 16, 2012 at 1:09am

सुन्दर प्रयास ...

कुछ मूलभूत बातों को आत्मसात करें तो रचना ग़ज़ल होने के क्रम में और आगे बढेंगी

कृपया ध्यान दे...

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