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आज वह अखबार पढते हुए ना जाने क्यों इतना उदास था ! इसी बीच उसकी नन्ही बच्ची ग्लोब लेकर उसके पास आ गई और कहने लगी:
"पापा, आज क्लास में बता रहे थे कि भारत ऋषि मुनियों और पीर फकीरों की धरती है, और उसको सोने की चिड़िया भी कहा जाता है ! आप ग्लोब देख कर बताईये कि भारत कहाँ हैं ?"
उसकी नज़र सहसा अखबार के उस पन्ने पर जा टिकी जो कि हत्या, लूटपाट,आगज़नी, दंगा फसाद, आतंकवाद, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भूख से होने वाली मौतों,धार्मिक झगड़ों और मंदिर-मस्जिद विवादों से भरा पड़ा था ! उसकी बेटी ने एक बार फिर उसका कन्धा झिंझोड़ कर पूछा:
"बताईये ना पापा भारत कहाँ हैं ?"
उसने एक लम्बी सी ठंडी आह भरी, और बेटी के सिर पर हाथ रख कर जवाब दिया:
"मेरी बेटी, जिस भारत कि बात तुम कर रही हो, वो भारत इस ग्लोब में नहीं है !"

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Comment by Gurpreet Singh jammu on February 23, 2023 at 4:50pm

उफ़्फ़्फ़ क्या कहें। बहुत ही शानदार रचना


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 3, 2015 at 7:54pm
सफल लघुकथा । मर्म का कमाल का सम्प्रेषण।
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 14, 2012 at 12:41pm

आदरणीय महोदय योगराज जी, सादर अभिवादन 

उसी भारत को मैं भी ढूढ़ रहा हूँ.

बधाई.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 14, 2012 at 12:30pm

आज इस लघुकथा को पुनः पढ़ने का शुभ-संयोग बना है और मैं पुनः आपकी संप्रेषणीयता पर मुग्ध हुआ हूँ.

सादर

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 14, 2012 at 10:06am

योगराज जी सादर नमस्कार ! बस अंतिम एक पंक्ति ने पूर दर्द बयान कर दिया !"मेरी बेटी, जिस भारत कि बात तुम कर रही हो, वो भारत इस ग्लोब में नहीं है !" वाह ...क्या सच्छाई व्यक्त किया है आपने इस लघु कथा में ! बहुत बहुत बधाई !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 14, 2012 at 9:28am

जिस भारत कि बात तुम कर रही हो, वो भारत इस ग्लोब में नहीं है !"

अद्भुत... शिल्प, कथ्य, रोचकता, के साथ जहन में प्रश्नों का उठना.
अद्वितीय लघुकथा है यह.. हार्दिक बधाई स्वीकारें आ. योगराज जी.
Comment by Bhasker Agrawal on December 25, 2010 at 2:21am
सही बात...सुन्दर प्रस्तुति
Comment by Surinder Narang on December 21, 2010 at 11:46pm

Sahi Kaha

Surinder Narang

Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on October 20, 2010 at 10:30pm
प्रभाकर भाई,
सच में अपना वो भारत कहीं गुम हो गया है...चलो हम सभी मिल कर उसे ढूंढें और उसे फिर से संसार का सिरमौर बनायें.. आपकी हर बात में एक मार्मिक अपील रहती है जो मन को झझकोर जाती है...
Comment by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on October 19, 2010 at 7:45pm
उफ़्फ़, योगी जी, इस लघुकथा के वार से रीढ़ की हड्डी तक सिहर गयी, वो भारत इस ग्लोब में नही है, सीधा सपाट व्यक्तव्य..वर्तमान के चेहरे पर कंटीले यथार्थ का करारा सनसानाता हुआ चपत...मुबारक हो.

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