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भिड़ रही हैं परवतों से राइयां

हाय रे ये इश्क़ की बेताबियाँ
ले रही हैं ज़िन्दगी अंगड़ाइयां

क्या कहूँ इस से ज़ियादा आप को
मार डालेंगी मुझे तन्हाइयां

आजकल मातम है क्यूँ छाया हुआ
सुनते थे कल तक जहाँ शहनाइयाँ

दौर है ये ज़ोर की आजमाइशों का
भिड़ रही हैं परवतों से राइयां

चल पड़ा हूँ मैं निहत्था जंग में
लाज रख लेना तू मेरी साइयां

इक जगह टिकती नहीं हैं ये कभी
मुझ सी ही नटखट मेरी परछाइयाँ

इतनी सुन्दर बीवियां दिखती नहीं
जितनी सुन्दर काम वाली बाइयां

'अलबेला' है मसखरा, शायर नहीं
ढूंढिए मत ग़ज़ल में गहराइयां

-अलबेला खत्री

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Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on August 21, 2012 at 5:55pm

क्या शानदार ग़ज़ल पेश की आदरणीय.. मगर बह्र (समंदर) में गहराईयाँ नहीं ढूँढेंगे तो क्या ढूँढेंगे..? :-))

दौर है ये ज़ोर की आजमाइशों का
भिड़ रही हैं परवतों से राइयां

सादर..

Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 5:21pm

बहुत बहुत धन्यवाद श्री राम जी.........
आपको  रचना पसंद आई
मेरे लिए ख़ुशी की बात है
__सादर

Comment by श्रीराम on August 21, 2012 at 5:03pm

bhut acchi rachna...........

Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 4:31pm

जय हो जय हो जय हो
आपकी जय हो आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद लड़ी वाला  जी........
कल मेले में भी हम तो आपके साथ थे........
आज भी आपका सान्निध्य और आशीर्वाद मिल रहा है....
सचमुच बड़ा आनन्द आ रहा है
आपकी बधाई सर आँखों पर  हुज़ूर..........
आपकी सराहना  कुबूल, कुबूल कुबूल
बस यों ही स्नेह बनाए रखिये,,,,,,,,,,
धीरे धीरे अपनी ग़ज़ल में भी गहराई आ जाएगी.....

वैसे कहना नहीं किसी से, 
आपकी  रूचि,आपकी  सतत ऊर्जा और  आपका समर्पण  स्तुत्य है
मैं आपको हृदय से नमन कर  रहा हूँ  जी........

सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 21, 2012 at 4:15pm

ले तो लो बधाइयां 

कल तलक थे ओबीओ मेले में 
कहाँ थी तन्हाइयां ?
कल तलक बजा रहे थे खुद भी 
रंगा रंग छंदों की शहनाइयां 
आज हैरान कर रही है 
खुद की ही परछाइयां ?
कल तलक थी मैडम परी सी 
शादी के बाद अब  
सुंदर लगती कामवाली बाइयां ?
अलबेला है करत मसखरी शायरी 
कहता है ढूंढो मत गजल में-
गहराइयां ?
श्रद्धेय तिलक राज ही परखेंगे अब 
कितनी है तुम्हारी गजल में-
गहराइयां ?
क्षमा याचना के साथ मेरी 
ले तो लो बहुत बधाइयां 
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 12:40pm

धन्यवाद भाई संदीप जी...........
बहुत बहुत  शुक्रिया ........
आपकी सराहना सर आँखों पर

सादर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 21, 2012 at 12:34pm

जनाब यही तो कमाल है आपका
के गहराइयां ढूँढने जो जाएगा उसे उसकी गहराई से उबारा कैसे जाएगा
वो तो फस जाएगा न
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है सर जी
और हास्य न हो तो वो आपकी रचना ही नहीं
काम वाली बाइयां इसका इक पक्ष है

बहुत बहुत बधाई सर जी इस उत्तम रचना हेतु

चल पड़ा हूँ मैं निहत्था जंग में
लाज रख लेना तू मेरी साइयां

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