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व्याजोक्ति [लघु कथा ]

आलोक की बहन रीमा के पति के अचानक अपने घर परिवार से दूर पानीपत में हुए निधन के समाचार ने आलोक और उसकी पत्नी आशा को हिला कर रख दिया |दोनों ने जल्दी से समान बांधा ,आशा ने अपने ऐ टी म कार्ड से दस हजार रूपये निकाले और वह दोनों पानीपत के लिए रवाना हो गए ,वहां पहुंचते ही आशा ने वो रूपये आलोक के हाथ में पकड़ाते हुए कहा ,''दीदी अपने घर से बहुत दूर है और इस समय इन्हें पैसे की सख्त जरूरत होगी आप यह उन्हें अपनी ओर से दे दो और मेरा ज़िक्र भी मत करना कहीं उनके आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचे''|अपनी बहन के विधवा होने पर अशोक बहुत भावुक हो रहा था ,उसने भरी आँखों से चुपचाप वो रूपये अपनी बहन रीमा के हाथ थमा दिए | देर रात को रीमा अपनी बहनों के साथ एक कमरे में सुख दुःख बाँट रही थी तभी आशा ने उस कमरे के सामने से निकलते हुए उनकी बाते सुन ली, उसकी आँखों से आंसू छलक गए ,जब उसकी नन्द रीमा के शब्द पिघलते सीसे से उसके कानो में पड़े ,वह अपनी बहनों से कह रही थी ,''मेरा भाई तो मुझसे बहुत प्यार करता है , आज मुसीबत की इस घड़ी में पता नही उसे कैसे पता चल गया कि मुझे पैसे कि जरूरत है ,यह तो मेरी भाभी है जिसने मेरे भाई को मुझ से से दूर कर रखा है |

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Comment by Rekha Joshi on July 24, 2012 at 12:10pm

आदरणीया राजेश जी ,आपने सही लिखा है ,लेकिन आजकल जिंदगी की आपाधापी में किसी को समझने का समय ही नही है अगर सब एक दूसरे को समझने लगें तो रिश्तों की मिठास बरकरार रहे गी ,आपका बहुत बहुत आभार 

Comment by Rekha Joshi on July 24, 2012 at 11:49am

संदीप जी ,आपका आभार 

Comment by Rekha Joshi on July 24, 2012 at 11:48am

आशीष जी ,यही तो विडम्बना है ,समाज में लोगों की सोच बहुत छोटी है ,आपको कथा पसंद आई ,आभार 

Comment by Rekha Joshi on July 24, 2012 at 11:43am

आदरणीय बागी जी ,सादर नमस्ते ,आपकी बधाई स्वीकार की ,आपके अनमोल सुझावों के लिए मै हृदय से आभारी हूँ ,आपका बहुत बहुत धन्यवाद  

Comment by Rekha Joshi on July 24, 2012 at 11:32am

सतीश जी ,आपका बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by Rekha Joshi on July 24, 2012 at 11:31am

आदरणीय अम्बरीश जी .सादर नमस्ते ,आपको यह लघु कथा पसंद आई ,आपका बहुत बहुत धन्यवाद ,ऐसे ही उत्साह बढ़ाते रहिये ,आभार  

Comment by Rekha Joshi on July 24, 2012 at 11:27am

आदरणीय सौरभ जी ,सादर नमस्ते  ,आपका कमेन्ट मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है ,आभार 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 24, 2012 at 10:35am

बहुत सुन्दर लघुकथा कही है रेखा जोशी जी. कहानी अपना सन्देश देने में भी सफल रही है जिसके लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें. गणेश बागी जी ने बहुत महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, उन पर अवश्य ध्यान दें. दरअसल लघुकथा एक ऐसी विधा है जिसमे एक भी फालतू शब्द कहानी की सुन्दरता घटा सकता है. उदहारण के लिए आपकी इस कहानी में पानीपत का दो बार ज़िक्र आना तथा एटीएम से पैसे निकलवाने की बात को अगर नहीं भी कहा जाता तो कोई फर्क न पड़ता. बल्कि कहानी और चुस्त और सधी हुई बन जाती. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 24, 2012 at 10:22am

आज  के समाज में कुछ रिश्ते इतने शुष्क  हो गए हैं की लोग मन में एक धारणा बना कर बैठ जाते हैं जैसा की इस कहानी में चाहे ननद भाभी हो या सास बहु एक दूसरे के बीच दिलों में दूरी का एहसास होता है मुझे यह  वार्तालाप में दूरी के कारण अधिक लगता है जहां दो इंसान दिल खोलकर एक दूसरे से बात नहीं करेंगे वहां दुनिया भर की भ्रांतियां पैदा हो जाती हैं जिसके कारण कई समस्याएं रिश्तों में कडवाहट भर देती हैं जैसा की इस कहानी में यदि भाभी ने कभी दिल खोलकर बातचीत के माध्यम से अपनी ननद को आत्मीयता दिखाई होती तो ननद ये शब्द कभी ना कहती इसका सीधा सा मतलब है ननद अपनी भाभी को कभी समझ ही नहीं पाई या भाभी ने कभी समझाया ही नहीं -------------आपकी कहानी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है --------बहुत ही अच्छा लिखा है आपने आपको हार्दिक बधाई 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 24, 2012 at 10:16am

अच्छी लघु कथा के लिए बधाई आपको आदरणीया रेखा जी

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