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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- १९

मैं मंजिल के करीब आकर बिखर न जाऊं

सोचता हूँकि आज रात अपने घर न जाऊं

 

मुझे भी है इन्तेज़ार उम्रदराज़ हो जाने का

दिनभर बेरोज़गार रहूँ और दफ्तर न जाऊं

 

लहरोंको देख तेरी नज़रों की याद आती है

मैंने सोचा हैकि फिर कभी समंदर न जाऊं

 

गली में कुहराम मचा है और मैं बच्चा हूँ

माँ ने कहा है कि मैं घर से बाहर न जाऊं

 

छोड़ गया है अपना कुनबा बीवीकी खातिर 

अब्बा कहतें हैंकि मैं बड़े भाई पर न जाऊं

 

रोक लेती हैं मेरे कदम तेरी डबडबाई आँखें

अबजो जाऊं कभीतो तुझे बताकर न जाऊं

 

खो गया है दिल मेरा और तुम ये कहतेहो

अपना दिल ढूँढने मैंकूचाएदिलबर न जाऊं

 

जिउं तो जिउं इस हालमें और मरुँतो राज़

मैं इस जहाँ से लेकर दूसरा पैकर न जाऊं

 

© राज़ नवादवी

पुणे, १७/०३/२०१२

 

कूचाएदिलबर- दिल चुरा लेनेवाले आशिक की गली; पैकर- शरीर 

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Comment by राज़ नवादवी on September 21, 2012 at 12:43am

मैं शेर कहता गया और वो वाह वाह करते गए,

वो वाह वाह करते गए और मैं शेर कहता गया

 

न वो रुके न हम, न रुकी अपनी बज्मेबैतबाज़ी

वक्त बेखबर जंगल की इक नदी-सा बहता गया  

- आपका बहुत बहुत शुक्रिया सीमाजी. 

Comment by seema agrawal on September 21, 2012 at 12:10am

पता नहीं अब तक आपके कलाम अनजान क्यों रहे ...हर एक शेर कमाल है किसकी बात करूँ अलग से..... सीधे-सादे शब्दों में गहरी बात 

मुझे भी है इन्तेज़ार उम्रदराज़ हो जाने का

दिनभर बेरोज़गार रहूँ और दफ्तर न जाऊं .....

छोड़ गया है अपना कुनबा बीवीकी खातिर 

अब्बा कहतें हैंकि मैं बड़े भाई पर न जाऊं...वाह 

रोक लेती हैं मेरे कदम तेरी डबडबाई आँखें

अबजो जाऊं कभीतो तुझे बताकर न जाऊं..बहुत खूब राज जी मुबारकबाद 

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