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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५

कब तलक यूँ ही गली-गली में सताई जाएँगी बेटियाँ 
कभी ज़हेज़ तोकभी इज्ज़तको जलाई जाएँगी बेटियाँ 

कब तलक दुल्हन बननेके लिए गैरतके खरीदारों को 
सजा-धजाके किसी खिलौनेसी दिखाई जाएँगी बेटियाँ

माँ बहन बीवी और बेटी सभी हैं आखिरशतो बेटियाँ
फिर क्यूँ कब्रसे पहले हमल में सुलाई जाएँगी बेटियाँ 

खुदा भी क्या सोचता होगा आलमेअर्श में बैठा- बैठा
अगले खल्कमें सिर्फ और सिर्फ बनाई जाएँगी बेटियाँ 

अगर यूँ ही बेटियों को तआस्सुब से देखा जाएगा तो 
नामकी रहजाएँगी और नमूनेमें दिखाई जाएँगी बेटियाँ

देखिए ये मुल्क कब समझेगा बेटियोंकी कीमत राज़
कब तलक बेटोंकी खुशीके लिए रुलाई जाएँगी बेटियाँ

© राज़ नवादवी
भोपाल, संध्याकाल ०७.१३, २४/०६/२०१२ 

ज़हेज़- दहेज; हमल- गर्भ; आलमेअर्श- देवलोक; खल्क- सृष्टि; तआस्सुब- पक्षपात; 

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Comment

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Comment by राज़ नवादवी on June 28, 2012 at 10:20am

धन्यवाद भाई निगमजी एवं मिश्राजी! मेरा ये मानना है कि यह हास्य के बजाए एक तंज (व्यंग) है हमारे समाज की एक ज्वलंत समस्या पे! कदाचित आपका मतलब भी यही है.  - राज़ नवादवी. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on June 28, 2012 at 12:02am

खूबसूरत हास्य गज़ल

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