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जब जब बेटी के ससुराल से फोन आता तो भार्गव जी अन्दर तक काँप उठते. दरअसल शादी के एकदम बाद दामाद ने नई कार देने की मांग रख दी थी. उसी वजह से कई बार बिटिया मायके आ भी चुकी थी. मामूली सी पेंशन पाने वाले भार्गव जी हर बार बिटिया को समझा बुझा कर वापिस भेज देते. लेकिन इस बार ससुराल का इतना दबाव था कि बिटिया समझाने पर भी नहीं मान रही थी और ज़िद पकड़ कर बैठ गई थी. भार्गव जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें.

आखिर एक दिन
अचानक दामाद के लिए नई कार आ ही गई, और बेटी अगले रोज़ अपने पति के साथ नई गाड़ी में ख़ुशी ख़ुशी विदा हो गई. भार्गव जी के मन से एक भारी बोझ उतरा, लेकिन उनकी पत्नी ऐसी अनुचित मांग को पूरा करने पर बेहद नाराज़ थी.

"आज तो आपने इनकी मांग पूरी कर दी, लेकिन कल इन्होने कोई और महंगी चीज़ मांग ली तब आप क्या करोगे ?"
"चिंता काहे करती हो भगवान्, अभी तो एक और किडनी मौजूद है मेरे शरीर में."

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Comment by Bhawesh Rajpal on June 24, 2012 at 9:48am
इस एक पंक्ति ने ह्रदय झकझोर कर रख दिया  !  नसों में क्रोध दौड़ने लगता है , यदि समाज में ऐसे लोग हैं  तो उन्हें भी उनकी  बेटियों को उनसे बढ़ कर ससुराल मिलनी चाहिए !
बहुत-बहुत बधाई  आपको आदरणीय योगराज जी  !  

"चिंता काहे करती हो भगवान्, अभी तो एक और किडनी मौजूद है मेरे शरीर में."

Comment by Er. Ambarish Srivastava on June 24, 2012 at 9:37am

//भार्गव जी के मन से एक भारी बोझ उतरा, लेकिन उनकी पत्नी ऐसी अनुचित मांग को पूरा करने पर बेहद नाराज़ थी.//

आदरणीय योगराज जी, आप की उपरोक्त बेहतरीन लघुकथा अपने आप में सम्पूर्ण है | इस हेतु बहुत बहुत बधाई स्वीकारें ! भार्गव जी जी पत्नी की नाराजगी एकदम जायज है|

//"चिंता काहे करती हो भगवान्, अभी तो एक और किडनी मौजूद है मेरे शरीर में."// ने तो एकदम दिमाग को झिंझोड के ही रख दिया...... फिर भी किसी मोहवश या किसी भी अन्य कारणवश प्रिय से प्रिय व्यक्ति की अनुचित मांग के पूरा करना उचित नहीं है | परन्तु भार्गव जी नें  सोंच विचार कर एक पिता का दायित्व निभाते हुए जो भी उचित समझा, किया...... मेरे विचार में यह और भी बेहतर होता यदि भार्गव जी अपनी बिटिया के ससुरालवालों को क़ानून का सहारा लेकर उचित सबक सिखा देते ....यदि ऐसा होने लगे ..तो इस समाज में मौजूद दहेज के लोभी भूखे भेड़िये आगे से कभी भी ऐसी अनुचित मांग रखने की हिम्मत नहीं कर सकेंगे | सादर

Comment by Savita Singh on June 24, 2012 at 12:22am

अच्‍छी लघुकथा है...लेकिन यह कोई समाधान नही, दहेज जैसी कुप्रथा का। इस पर विचार करने से अच्‍छा है इस कोढ़ का समूचित इलाज किया जाय। मजबूर को न और मजबूर किया जाय और न ही संपन्‍न व्‍यक्ति दिखावा कर कर के इसे और अधिक बढ़ावा ही दे।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 23, 2012 at 10:09pm

कथा किसी अवश पिता की मात्र विवशता को ही नहीं प्रस्तुत करती बल्कि आजके समाज में नारी की सबल सोच का भी बखान करती है - भार्गव जी के मन से एक भारी बोझ उतरा, लेकिन उनकी पत्नी ऐसी अनुचित मांग को पूरा करने पर बेहद नाराज़ थी.
इस पंक्ति ने इस लघुकथा में अभिनव शेड्स दिये हैं जो आनेवाले समय की प्रतिच्छाया हैं.  वर्तमान और आगामी समय की सोच बेहतरीन ढ़ंग से मुखरित हुई है.

जहाँ अपनी लाडली की खुशियों के लिये सहर्ष अपनी एक किडनी बेचता एक विवश पिता ’आज’ की विडंबनाओं का अक्स है तो वहीं उसी बेटी की माँ आगामी समय की सार्थक झलक है जो दृढ़ता के साथ अपने पक्ष रखती है.   ईश्वर उस आनेवाले समय की सोच से समाज-परिवार को शीघ्र आप्लावित करे.

जिस आसानी से कथा सीधे दिल में उतरती है वह कथा-कहन का उत्कृष्ट उदाहरण है, आदरणीय योगराजभाईसाहब.

आपकी इस उत्कृष्ट रचना के लिये आपको हृदय से नमन.

सादर

Comment by AVINASH S BAGDE on June 23, 2012 at 8:07pm

ooooooooooooooooof!!!!!

lekin dardnak sachchai hai.

hriday-sparshi laghu katha

wah!

Yograj ji....

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on June 23, 2012 at 6:26pm
बहुत मार्मिक ढंग से आपने दहेज की समस्या पर प्रहार किया योगराज सर। बहुत अच्छी कहानी। बधाई।
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 23, 2012 at 4:53pm

आदरणीय योगराज जी, सादर
उफ़
कितना मजबूर है एक पिता.
दानव हैं दहेज लोभी.
बेटी के प्यार लुटाया घर संसार
वाह बाप तेरा अनोखा प्यार्
मांग पर दूसरा गुर्दा देने को तैयार
नमस्कार नमस्कार नमस्कार
बधाई, सर जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 23, 2012 at 4:34pm

एक बाप का बेटी के प्रति अथाह प्यार आपकी लघु कहानी में झलक रहा है इस प्यार और माता पिता का सामजिक डर ही ऐसे लालची दामादों और ससुराल वालों को बढ़ावा देता है बेटियों को भी अब सचेत होना पड़ेगा और इस दहेज़ प्रथा नामक विष को ख़त्म करना होगा ........अन्दर तक सिहरा  गई यह  रोंगटे खड़े कर देने वाली  कहानी.....बधाई योगराज जी 

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on June 23, 2012 at 1:43pm

aadarnye yograj sir dahej pratha waqai me ek bahut badi beemari he jo hamare samaj me fel chuki he ek baap ke dil ke dard ko aapne is rachna me bahut achchi tarah se vyakt kiya hai ... हार्दिक बधाई इस लघु कथा पर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 23, 2012 at 1:25pm

आदरणीय योगराज जी बहुत उत्कृष्ट लघुकथा लिखी आपने, अंत सीधे दिल पर वार करता है. समाज में व्याप्त वर-दक्षिणा कुरीति का दानव  कैसे एक बेटी के मन में डर, माता-पिता की ज़िंदगी में बेबसी को लाता है,,, एक लाचार पिता और कर भी क्या सकता है? इन तथ्यों को बखूबी उजागर किया है... हार्दिक बधाई इस लघु कथा पर.

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