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अब मुझे पता न बताओ मेरी मंजिलो का

अब मुझे पता न बताओ मेरी मंजिलो का
पूझे पता है की मुझे जाना किधर है

वही से आया हू वही जाऊंगा बेफिक्र रह
चाहो तो भाल पर पढ़ लो नक्सा इधर है

लूटे नहीं इस शहर में अमीर के घर
जो लुटी है  गरीबों की बस्ती उधर हैं

अमन सकूं की बातें तो होती है यहाँ फुर्सत में
मगर हर घड़ी  सारे दिलों में खौफ इधर है

झूंठ को बोलते हैं लोग  यहाँ सच की तरह
बयां करने पर हकीकत कांपते अधर हैं .

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Comment by yogesh shivhare on June 12, 2012 at 5:38pm

आशीष जी आभारी हूँ आपके स्नेह का

Comment by आशीष यादव on June 12, 2012 at 3:18pm
अच्छी रचना है।
"झूठ को लोग यहाँ सच की तरह" वाह क्या बात कहे हैँ
बधाई स्वीकारेँ
Comment by yogesh shivhare on June 11, 2012 at 8:58pm

उमाशंकर जी बहुत बहुत धन्यवाद् आपने अपने शब्दों से जो मान  दिया है आभार

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 11, 2012 at 5:50pm

योगेश जी अच्छी रचना है बधाई आपको

झूंठ को बोलते हैं लोग  यहाँ सच की तरह
बयां करने पर हकीकत कांपते अधर हैं .

 अंतिम पक्ति कटु  सत्य को दर्शा रही है|

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