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गीत -मैं भी कुछ सुनाऊँ तुमको, जो एसी भी शक्ति दी होती

मैं भी कुछ सुनाऊं तुमको,
जो ऐसी भी शक्ति दी होती

हे माँ तेरी चरणों में,
कुछ मेरी भी अर्जी तो होती

मैं दीन हूँ माँ समझो,
पर हीन न समझा करो

सीने से न अपने सही,
चरणों से न दूर करो

मैं पुत्र कुपुत्र हूँ माँ,
समझा न तेरे मन को

तुम तो माँ कुमाता नहीं,
समझो तो मेरे मन को

थोड़ा मुझ को भी दे दो माँ,
स्नेह अपनी झोली से तुम

है माँ बेटे का नाता,
माँ खोयी हो कहाँ तुम |

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Comment

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Comment by जगदानन्द झा 'मनु' on June 8, 2012 at 1:49pm

आपका हार्दिक धन्यवाद   PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA जी......

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 8, 2012 at 1:04pm

माता के प्रति भक्ति, श्रद्धा को नमन , बधाई.

Comment by जगदानन्द झा 'मनु' on June 7, 2012 at 9:50pm

आपका हार्दिक धन्यवाद Rekha Joshi   जी......

Comment by Rekha Joshi on June 7, 2012 at 8:44pm

मनु जी ,बहुत बढ़िया पंक्तियाँ ,

तुम तो माँ कुमाता नहीं, 
समझो तो मेरे मन को ,माँ अपने बच्चे की दिल की बात जान लेती है ,अच्छी रचना पर बधाई |
Comment by जगदानन्द झा 'मनु' on June 7, 2012 at 4:30pm

श्री मान  अलबेला  खत्री जी आपने तो मेरे शव्दो में जान डाल दिया, आपका तहे दिल से शुक्र गुजार व आभारी रहूँगा |

साथ ही संपादक महोदय से निवेदन है की, इस नये फोर्मेट को स्वीकार कर कृतार्थ करे |
Comment by Albela Khatri on June 7, 2012 at 4:15pm

बहुत अच्छा लगा  जगदानन्द झा मनु  जी आपकी कविता बांच कर
बधाई आपको  इस रचना के लिए

____एक सुझाव है कि कृपया  प्रकाशित करने के पहले  चैक  कर लिया कीजिये .  क्योंकि कई बार टंकण में  जल्दबाजी के कारण  बहुत सी त्रुटियाँ  भी  रह जाती हैं .  साथ ही  पंक्तियों के बीच थोड़ा खाली स्थान भी रखा कीजिये  ताकि पढ़ने में आसानी हो और आकर्षक भी लगे.  मनु जी,  कविता  सब कलाओं में सुन्दर कला है .  इसलिए कविता की प्रस्तुति भी सुन्दर दिखनी चाहिए .

मैंने आपकी इस कविता में  आपकी अनुमति के बिना  कुछ बदलाव किया है ..यदि पसन्द आये तो  आप  प्रयोग कीजिये और न पसन्द आये तो इसे वापिस मेरे मुंह पर मार दीजिये
____

मैं भी कुछ सुनाऊं  तुमको,
जो ऐसी  भी शक्ति दी होती

हे माँ तेरी चरणों में,
कुछ मेरी भी अर्जी तो होती

मैं दीन हूँ माँ समझो,
पर हीन न समझा करो

सीने से न अपने सही,
चरणों से न दूर करो


मैं पुत्र कुपुत्र हूँ माँ,
समझा न तेरे मन को

तुम तो माँ कुमाता नहीं,
समझो तो मेरे मन को

थोड़ा मुझ को भी दे दो माँ,
स्नेह अपनी झोली से तुम

है माँ बेटे का नाता,
माँ खोयी हो कहाँ तुम |

_________सादर

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