For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

एक सूख कर टूटी हुई डाली थी ज़मीं पर,
वो आया और पतझड़ को भी सावन बना गया I
 
यूँ थाम अपने हाथ डाली मुस्कुरा उठा,
वो स्वप्न ज़िन्दगी के मौत में जगा गया I
 
पपड़ी थी तिरस्कार की डाली पे जो जमी,
नेह की शबनम से वो उसको हटा गया I
 
हक मान अपने हाथ डाली जिस्मों जान के,
ज्ञान बाण भेद वो कन्दरा गढा गया I
 
फिर सप्त छिद्र भेद के उस शून्य नली में,
प्यार की सरगम बहे, वंशी बना गया I
 
सुर रूप सजी बांसुरी, हो पूज्य सर्वदा,
कृष्ण के अधरों पे वो, उसको सजा गया I
 
आन बान शान हाथ सौंप बांसुरी,
ज़र्रे को ज़मीं के वो सितारा बना गया I

Views: 684

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 3, 2012 at 5:27pm
 आदरणीय गणेश बागी जी, इस रचना को सराहने के लिए हार्दिक आभार..
मै आज कल ग़ज़ल के पाठ पढ़ रही हूँ, और ग़ज़ल की हर बारीकी को आत्मसात करने के बाद ही ग़ज़ल पर कलम आजमाऊंगी. शीघ्र ही प्रयास करूंगी अच्छी ग़ज़ल लिख सकूं.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 3, 2012 at 4:50pm

खुबसूरत रचना, प्रयास करें तो यह रचना सहज ही ग़ज़ल बन सकती है, प्रयास पर बधाई स्वीकार करें |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 31, 2012 at 12:00pm

इस रचना को सराहने हेतु हार्दिक आभार आदरणीय योगराज प्रभाकर जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 31, 2012 at 11:52am

//पपड़ी थी तिरस्कार की डाली पे जो जमी,

नेह की शबनम से वो उसको हटा गया I//
बहुत सुन्दर रचना है डॉ प्राची सिंह जी, बधाई स्वीकार करें.  

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 31, 2012 at 9:48am

हार्दिक आभार आदरणीय प्रदीप कुशवाहा जी, वंदना गुप्ता जी, उमाशंकर मिश्रा जी

Comment by UMASHANKER MISHRA on May 30, 2012 at 10:30pm

तिरस्कार को  प्यार के आंसू से बहा दिया

बहुत सुन्दर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 30, 2012 at 3:58pm

आदरणीय प्राची   जी, सादर 

सुर रूप सजी बांसुरी, हो पूज्य सर्वदा,
कृष्ण के अधरों पे वो, उसको सजा गया I 
बधाई. 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 30, 2012 at 10:09am

आदरणीय डॉ. सूर्य बाली जी, आपने अपना कीमती वक़्त इस कविता को दिया व हार्दिक बधाइयां प्रेषित की..इस सराहना हेतु आपका बहुत बहुत आभार .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 30, 2012 at 10:07am
 इस रचना को सराह कर उत्साहवर्धन करने के लिए  हार्दिक आभार रेखा जोशी जी, भावेश राजपाल जी

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 30, 2012 at 10:06am

आपने इस रचना को सराह कर मान दिया, हार्दिक आभार आदरणीया राजेश कुमारी जी..

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"वो तराना नहीं कि तुझ से कहें आशिक़ाना नहीं कि तुझ से कहें । यह शेर कहता है कि यह तराना आशिक़ाना…"
20 minutes ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"यह मेरी बेध्यानी का परिणाम है, मुझे और सतर्क रहना पड़ेगा। "
48 minutes ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"यह तो ऋचा जी की ग़ज़ल पर कहा था, यहॉं न जाने कैसे चिपक गया। आपकी ग़ज़ल अभी पढ़ी नहीं है।"
52 minutes ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"मुझे लगता है कि मूल ग़ज़ल के शेर की विवेचना यह समझने में सहायक होगी कि ऐसी कठिन ज़मीनों पर शेर कैसे…"
54 minutes ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय तिलक जी नमस्कार  बहुत बहुत आभार आपका इतनी बारीक़ी से  हर एक बात बताई आपने और बेहतर…"
1 hour ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"कुछ भी होना नहीं कि तुझसे कहें रोना धोना नहीं कि तुझसे कहें १ मतले में जो क़ाफ़िया निर्धारित हुआ…"
2 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"ग़ज़ल में बह्र, रदीफ़, क़ाफ़िया का पालन अच्छा हुआ है। ग़म-ए-दौलत मिली है किस्मत से, ये लुटाना नहीं…"
2 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय, मैने तो आना के हिसाब से ही सब काफिया लिखे है। पूरी रचना पर टिप्पणी करते तो कुछ सीखने का…"
4 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"सच फ़साना नहीं कि तुझ से कहें ये बहाना नहीं कि तुझ से कहें। शेर का शेर के रूप में पूरा होना और एक…"
9 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"इस मंच पर ग़ज़ल विधा पर जितनी चर्चा उपलब्ध है उसे पढ़ना भी महत्वपूर्ण है। इस पर विशेष रूप से ध्यान…"
10 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"धन्यवाद ऋचा जी।  गिरह ख़ूब हुई // आप भी मनजीत जी की तरह फ़िरकी ले रहीं हैं। हा हा "
10 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय अजेय जी नमस्कार  बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई आपकी बधाई स्वीकार कीजिए  गिरह ख़ूब…"
10 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service