शहर ये हो गया शमशान कहीं और चलें॥
बस्तियाँ हो गईं वीरान कहीं और चलें॥
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई यहाँ,
है नहीं कोई भी इंसान कहीं और चलें॥
जागने और जगाने की बात किससे करें,
यहाँ तो सोया है भगवान कहीं और चलें॥
कोई जोरू से कोई ज़र से ज़मीं से कोई,
हैं सभी लोग परेशान कहीं और चलें॥
आईना अंधों की बस्ती में बेंचने निकला,
चल सकी न मेरी दूकान कहीं और चलें॥
दोस्त दुश्मन सभी चेहरे पे लगाए चेहरे,
कर सका मैं नहीं पहचान कहीं और चलें॥
वक़्त के साथ बदलते हुए चेहरे “सूरज”
देख के मैं भी हूँ हैरान कहीं और चलें॥
डॉ. सूर्या बाली “सूरज”
Comment
आईना अंधों की बस्ती में बेंचने निकला,
चल सकी न मेरी दूकान कहीं और चलें॥
दोस्त दुश्मन सभी चेहरे पे लगाए चेहरे,
कर सका मैं नहीं पहचान कहीं और चलें
आदरणीय श्री डॉ. बाली , बेहद खूबसूरत ग़ज़ल ! हर बार की तरह बेमिसाल
बेहतरीन गजल
वाह.... वाह..... के लायक
आदरणीय बाली जी
सादर नमस्कार, बहुत सुन्दर गजल सभी शेर वाह वाही के काबिल. बधाई.
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई यहाँ,
है नहीं कोई भी इंसान कहीं और चलें॥
वाह! वाह!
वाह सर, कथ्य-तथ्य सभी शानदार। हर शेर वाहवाही का हकदार।
बधाई स्वीकारें
शहर ये हो गया शमशान कहीं और चलें॥
बस्तियाँ हो गईं वीरान कहीं और चलें॥....सब छोड़ कहाँ जाओगे?
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई यहाँ,
है नहीं कोई भी इंसान कहीं और चलें॥.....हकीकत कैसे झुठलाओगे!
जागने और जगाने की बात किससे करें,
यहाँ तो सोया है भगवान कहीं और चलें॥....भगवान नहीं पाषाण है..
कोई जोरू से कोई ज़र से ज़मीं से कोई,
हैं सभी लोग परेशान कहीं और चलें॥....फिर भी फंसाए जान है..
आईना अंधों की बस्ती में बेंचने निकला,
चल सकी न मेरी दूकान कहीं और चलें॥....हर शै बाज़ार है..
दोस्त दुश्मन सभी चेहरे पे लगाए चेहरे,
कर सका मैं नहीं पहचान कहीं और चलें॥.....बस पीठ पे वार है.
वक़्त के साथ बदलते हुए चेहरे “सूरज”
देख के मैं भी हूँ हैरान कहीं और चलें॥....किरने सूरज की दमदार है..
वाह!डॉ. बाली वाह!
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल सुन्दर भाव
आईना अंधों की बस्ती में बेंचने निकला,
चल सकी न मेरी दूकान कहीं और चलें॥
ये कहना गलत होगा की बहुत ही अच्छी ग़ज़ल क्योंकि आप हमेशा ही अच्छा ग़ज़ल कहते हैं ! आदरणीय श्री डॉ. सूरज जी आपकी लेखनी को सलाम करता हूँ ! बहुत ही बढ़िया , सरल शब्द और स्पष्ट सन्देश ! वाह
आईना अंधों की बस्ती में बेंचने निकला,
चल सकी न मेरी दूकान कहीं और चलें॥
bahut sahi kaha, sir jii. badhai
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