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मांग मत अधिकार अपना, ये अनैतिक कर्म है,
ठेस लगती है, हुकूमत का बहुत दिल नर्म है.
 
हक हमारा कुछ नहीं, पुरखे हमारे लापता,
हर तरक्की के लिए, बस 'द्रष्टि उनकी' मर्म है.
 
सैर को आये कभी जब, मान उपवन गाँव को,
खेत सूखे देख कर, गर्दन झुकी है, शर्म है.
 
कह दिया गर, 'भूख से हम मर रहे है ऐ खुदा!'
ज्ञान मिलता, सब्र और विश्वास रखना धर्म है.
 
कट गए सद्दाम या लादेन, गद्दाफी यहाँ,
तब समझ में आ गया खूं कौम का भी गर्म है!

लूट, हिंसा और लिप्सा से निकलिए शेख जी,

भोर होने आ चली, काली निशा का चर्म है.

 

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on March 12, 2012 at 1:04pm

राकेश भाई मैं आपका विशेष धन्यवादी हूँ कि आपने ग़ज़ल के फार्मेट को स्वीकारा और अपनी ग़ज़ल पर अनेक चरणों में मेहनत की और इसे शिल्प के आधार पर सम्पूर्ण ग़ज़ल बना डाला
निः संदेह अब आपकी ग़ज़ल मूलभूत शिल्पगत खामियों से मुक्त है
आप विशेष बधाई के पात्र है
ओ.बी.ओ. मंच आप जैसे खुले विचार के रचनाकार को पा कर सार्थक हो रहा है
पुनः बधाई, धन्यवाद और आभार

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 12, 2012 at 10:43am

श्री वीनस जी, सहर्ष सूचित कर रहा हूँ की निम्न परिवर्तन किया है:
समझ उपवन (1222): मान उपवन (2122)
आदेश घोषित: ज्ञान(21) मिलता(22)

अब लगता है कविता पूरी तरह बह्र मे हो गयी है.आभार.

Comment by वीनस केसरी on March 11, 2012 at 7:46pm

कट गए सद्दाम या लादेन, गद्दाफी यहीं,
बधाई, यह मिसरा बिलकुल सही हो गया है

स + ड़क = १२ होता है इसे हम सड़ + क नहीं बोल सकते और न ही  २१ में गिन सकते हैं


आदेश घोषित, = २२१ २२ होता है जिसे २१२२ में नहीं बाँधा जा सकता है

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 11, 2012 at 4:27pm

मान्यवर अभिनव जी, आपकी 'वाह' सर आँखों पर.  धन्यवाद

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 11, 2012 at 4:05pm

श्री वीनस जी, आपकी इतनी मेहनत के लिए तहे दिल से आभारी हूँ.

सम(2)झ(1) उप(2)वन(2): ऐसे पढ़े.

बाकी के परिवर्तन निम्न हैं:

फी सड़क पर: को मैने यह कर दिया: फी(2) य(1)हीं(2). 

बोला गया तब: आ(2)दे(1)श घो(2)षित(2)

एक बार पुनः धन्यवाद देना चाहूँगा.

Comment by Abhinav Arun on March 11, 2012 at 3:55pm

आपकी ग़ज़ल में मूल भाव है वह बखूबी निखर कर सामने आ रहा है यही लेखन की सार्थकता है !

लूट, हिंसा और लिप्सा से निकलिए शेख जी,

भोर होने आ चली, काली निशा का चर्म है.

दौरे हाजरा पर गंभीर टिप्पणी करते शेरों के लिए दिली दाद कबूलें श्री राकेश जी !!

Comment by वीनस केसरी on March 11, 2012 at 12:58pm
मित्रवर राकेश जी,
ग़ज़ल के सभी शेर बह्र में हैं या नहीं इसको जानने का एकमात्र उपाय तकतीह प्रणाली है
तकतीह करते ही साफ़ हो जाता है कि कौन कौन सा शेर बह्र में है और कौन सा खारिज है
आप तकतीह प्रणाली पर पोस्ट को पहले ही पढ़ चुके है खुद भी अन्य ग़ज़ल कारों की ग़ज़लों को तकतीह करें ...
आपकी मदद के लिए इस ग़ज़ल की तकतीह कर रहा हूँ इस ग़ज़ल को आपने २१२२/२१२२ /२१२२/२१२ मात्रा पर लिखा है
 

मांग मत अधि / कार अपना, / ये अनैतिक / कर्म है,
२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२
ठेस लगती / है, हुकूमत / का बहुत दिल / नर्म है.
२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२
 
हक हमारा / कुछ नहीं, पुर / खे हमारे / लापता,
२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२
हर तरक्की / के लिए, बस / 'द्रष्टि उनकी' / मर्म है.
२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२
 
सैर को आ / ये कभी जब, / समझ उपवन / गाँव को,
२१२२   /    २१२२    /   १२२२   /    २१२
खेत सूखे / देख कर, गर् / दन झुकी है / शर्म है.
२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२
 
कह दिया गर / 'भूख से हम / मर रहे है / ऐ खुदा!'
२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२
बोला गया तब / सब्र औ' विश् / वास रखना / धर्म है.
२२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२
 
कट गए सद /दाम या ला / देन, गद्दा /फी सड़क पर,
२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२२ 
तब समझ में / आ गया खूं / कौम का भी / गर्म है!
२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२

लूट, हिंसा / और लिप्सा / से निकलिए / शेख जी,

२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२
भोर होने / आ चली, का / ली निशा का / चर्म है.
२१२२   /    २१२२    /   २१२२   /    २१२

तीन मिसरों में लय भंग हुई है यदि सुधर लें तो ग़ज़ल बा बह्र हो जायेगी

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 11, 2012 at 9:14am

Galti se aapka comment delete ho gaya:

Vindhyeshwari prasad tripathi commented on Rakesh Tripathi's blog post 'मांग मत अधिकार अपना'

क्या कमाल जिगर है आदरणीय कुछ ही शब्दों में चोट कर गए दिलो दल(पार्टियों)पर- 'मांग मत अधिकार…
Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 11, 2012 at 9:13am

मान्यवर त्रिपाठी जी, सौरभ जी एवं वीनस  जी, आप लोगो के इस कविता रूपी ग़ज़ल को पढ़ा और इतनी बारीक टिप्पणी दी है की फिर से इस मंच पर आना सफल लग रहा है. धन्यवाद.

आदरणीय सौरभ जी: ’निकलिए' ही होगा. मैं अभी ठीक कर देता हूँ. मैने इसे शुरू मे कविता के जैसाही लिखा था, एक तुकंत कविता. पर ओ बी ओ पर आया और ग़ज़ल की कक्षा के कुछ पाठ पढ़े तो लगा की अच्छी ग़ज़ल बन सकती है, तो ये प्रसास रहा.

माननीय वीनस जी: काफिया सच मे कठिन था और काफ़ी वक्त लगा भाव और शब्द को काफ़िए मे बंद करने मे. मुझे लगता है की "बोला गया तब सब्र और विश्वास रखना धर्म है" मे शायद लय कुछ खराब हुई है क्योकि 21 की बजे 22 हो गया है शुरू मे, और कहीं हो तो बेझिझक इंगित करें. आभारी रहूँगा.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 11, 2012 at 1:16am

बह्र ए रमल मुसम्मन महजूफ पर कही गयी ग़ज़ल. काफ़िया बिला शक़ कठिन लिया गया है. कोशिश अच्छी हुई है. वैसे कहन का निर्वहन और अच्छी तरह से हो सकता था. जिससे तथ्य बखूबी उभर कर आ सकते थे.  लेकिन जिस ढंग से प्रयास हुआ है वह संतुष्ट करता है. 

लूट, हिंसा और लिप्सा से निकालिए शेख जी   में ’निकालिए’ शायद टंकण त्रुटि है. यह ’निकलिए’  होगा. अन्य सभी मिसरों को तक्तीह करें तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी.

एक अच्छी कोशिश के लिये पुनः बधाई.

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