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मांग मत अधिकार अपना, ये अनैतिक कर्म है,
ठेस लगती है, हुकूमत का बहुत दिल नर्म है.
 
हक हमारा कुछ नहीं, पुरखे हमारे लापता,
हर तरक्की के लिए, बस 'द्रष्टि उनकी' मर्म है.
 
सैर को आये कभी जब, मान उपवन गाँव को,
खेत सूखे देख कर, गर्दन झुकी है, शर्म है.
 
कह दिया गर, 'भूख से हम मर रहे है ऐ खुदा!'
ज्ञान मिलता, सब्र और विश्वास रखना धर्म है.
 
कट गए सद्दाम या लादेन, गद्दाफी यहाँ,
तब समझ में आ गया खूं कौम का भी गर्म है!

लूट, हिंसा और लिप्सा से निकलिए शेख जी,

भोर होने आ चली, काली निशा का चर्म है.

 

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Comment by वीनस केसरी on March 23, 2012 at 12:57pm

श्रेष्ठ ग़ज़ल है पुनः पढ़ कर पुनः आनंदित हुआ

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 22, 2012 at 4:58pm

माननीय जवाहर जी, सादर, भगवान न करे किसी को भीख मगनी पड़े या बंदूक टांगनी पड़े. और शायद कोई छह के ऐसा करता भी नहीं होगा, मजबूरियां करवाती होंगी. इसलिए लिखा है.   

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on March 22, 2012 at 7:25am

Rakesh jee, badhai! bahut hee sundar rachan!

aapne baagee bhee bana diya aur wedna bhee jaga dee abhee bheekh aur bandook baakee hai! 

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 19, 2012 at 10:56am

माननीय जवाहर जी, सादर धन्यवाद. चार पंक्तियाँ और पेश कर रहा हूँ:

वो कवी कैसे, जो हैं बागी नहीं,
जिस ह्रदय में वेदना जागी नहीं.
देश द्रोही इस क्षुधा को वो कहे,
जिसका कुर्ता रक्त से दागी नहीं.

भीख गर उस शख्श ने मागी नहीं,
भूख से बंदूक भी टांगी नहीं,
अब बताओ किस तरह जी पाए वो,
देश के धन में जो सहभागी नहीं.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on March 18, 2012 at 8:13pm
राकेश जी..बधाई...बहुत उत्कृष्ट रचना....आपकी रचना में धार है जो कटु भी है और
व्यँग्यात्मक  
भी....भीतर भेद कर जिन्झोरती है...
Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 14, 2012 at 9:15am

माननीय सौरभ जी, सादर नमस्कार एवं आभार :)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 13, 2012 at 7:29pm

राकेशजी, अब मुकम्मल हो चुकी इस ग़ज़ल के लिये फिर से ढेर सारी बधाइयाँ.  वाह !!

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 13, 2012 at 5:50pm

Ji sadar abhar.

Comment by MAHIMA SHREE on March 13, 2012 at 11:45am
राकेश जी..बधाई...बहुत उत्कृष्ट रचना....आपकी रचना में धार है जो कटु भी है और वयांगातामक भी....भीतर भेद कर जिन्झोरती है...
Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 12, 2012 at 4:27pm

श्री वीनस जी ,सादर. जब मुझे ग़ज़ल की मूल परिभाषा ही ओ बी ओ पर मिली तो फिर ये आपका महानता है कि हमे सम्मान दे रहे हैं.  गुरु लोगो के सनिध्य मे प्रयास जारी रहेगा. धन्यवाद.

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