For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

रेशम के शहर आ बसा हूँ इस यकीन से
कोई तो मिले इश्क जिसे पापलीन से !

मैं चाँद सितारों के ज़िक्र में हूँ अनाड़ी,
इन्सान हूँ जुड़ा हुआ अपनी ज़मीन से !.

सच्चाई की तासीर तो कड़वी ही रहेगी,
आएगी न मिठास कभी भी कुनीन से !

मजबूरी-ए-हालात है कुछ और नहीं है,
जो मस्त लगा नाग सपेरे की बीन से !

बंगले मकान तो यहाँ लाखो ही मिलेंगे
घर ढूँढना पड़ेगा मगर दूरबीन से !

सर को उठाऊँ ग़र तो चूल्हा रहे ठंडा,
सर को झुकाऊँ गर तो गिरता हूँ दीन से

ससुराल में बिटिया के हालात जो सुने,
कांटे जिगर में चुभ गए लाखों महीन से !.

Views: 789

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by kanta roy on June 26, 2015 at 8:57am
सात शेर ने मिलकर जिंदगी के कितने बारीक पहलुओं को उभारा है । रिशम के शहर में .... का क्या कहना लाजवाब हो गये पढकर ....एक शायर चाँद तारों की बात भी कितने अनाड़ीपन में कह जाते है इसकी बानगी तो देखते ही बनती है । समाजिक विसंगतियों से आपका प्रभाविक होना आपकी शेर में सारे मर्म उभर कर आते है । आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी का हर शेर को पैनी नजर से देखने का अंदाज़ ... वाह !!!! ..... अच्छा लगता है आपको पढना । नमन श्री
Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on March 31, 2014 at 8:11am

आदरणीय योगराज जी
दिल कर रहा था की आपको पढ़ूँ. आख़िरकार खोज निकाली आपकी ये पुरानी ग़ज़ल. पढ़कर अच्छा लगा.
बहुत बहुत मुबारकबाद
इन दो अश्'आरो पर खुसुसी दाद हाजिर है.

मैं चाँद सितारों के ज़िक्र में हूँ अनाड़ी,
इन्सान हूँ जुड़ा हुआ अपनी ज़मीन से !.

सच्चाई की तासीर तो कड़वी ही रहेगी,
आएगी न मिठास कभी भी कुनीन से !

Comment by DEEP ZIRVI on October 7, 2010 at 10:09pm
कोई तो मिले इश्क जिसे पापलीन से !.....waah

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 20, 2010 at 10:35am
अपर्णा जी,
शेअर पसंद करने के लिए दिल से सादर धन्यवाद देता हूँ आपको !

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 20, 2010 at 10:34am
सौरभ भाई जी,
आपकी समीक्षा का Hangover ज़ेहन पर तारी रहा जिसकी वजह से प्रतिक्रिया देने में विलम्ब हुआ, क्षमाप्रार्थी हूँ ! आपकी टिप्पणी पढ़कर मुझे उर विशवास हो गया कि मेरा श्रम असफल नहीं गया ! दिल की गहराईयों से आपको सादर धन्यवाद देता हूँ जो आपने मेरे टूटे फूटे शेअरों को भी इतना मान बख्शा !
Comment by Aparna Bhatnagar on September 18, 2010 at 11:47pm
सर को उठाऊँ ग़र तो चूल्हा रहे ठंडा,
सर को झुकाऊँ गर तो गिरता हूँ दीन से

ससुराल में बिटिया के हालात जो सुने,
कांटे जिगर में चुभ गए लाखों महीन से !.
अंतिम शेर महीन काँटों -सा चुभ गया .... इस टीस को बिटिया और उसके माँ-बाबा ही महसूस कर सकते हैं या फिर एक कवि....

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 16, 2010 at 2:33pm
भाई योगराजजी, आपका लिखा मुझे पूरी तरह से अपनी रौ में बहा ले गया है. इधर दो-तीन दिनों से आपके एक-एक शेर को न सिर्फ़ गुन रहा हूँ बल्कि सही कहिए जी रहा हूँ. किस-किस का बयाँ करूँ -- बिटियावाला? घरवाला? मजबूरियोंवाला? किस हालात पर कहूँ?? पूरे वज़न और वज़ूद के साथ हरेक मुसल्लम है. ..मुसलसल रवानी के साथ.. चीखती हुई सचाई के साथ.

चकाचौंधभरे माहौल में अपनी ज़मीन भूल जाने वालों की कमी नहीं. इन माहौल में अपनी गठरियों को सहेज कर रखने वाले अक्सर नहीं हुआ करते. पर, उन गठरियों में पड़ी यादों और अपने माज़ी के टोकन की परस्तिश कोई विरला .. नहीं-नहीं.. कोई पगला-मनमौजी ही किया करता है. और उस विरले को एक अपने जैसा अदद ढ़ूँढते देखना सचमुच में नायाब लगा. .. कोई तो हो यहाँ जिसे याद है अभी भी अपनी पापलीनवाली ज़िन्दग़ी..!.

>>>> सर को उठाऊँ ग़र तो चूल्हा रहे ठंडा,
सर को झुकाऊँ गर तो गिरता हूँ दीन से..
कहते ऐसे ही जीते हैं जो जीने वाले हैं.
आपने वो कुछ कहा है .. ईमान भरी ज़िन्दग़ी या, ज़िन्दग़ी और फिर ईमान?.. इस सवाल को लेकर मन में मची हाय-तौबह हर-एक के लिए अहम है.. उसके अपने मायने है. और जो इसे जान गया वो कह ही उठेगा न.. " ..आएगी न मिठास कभी भी कुनीन से !.."

>>>>मजबूरी-ए-हालात है कुछ और नहीं है,
जो मस्त लगा नाग सपेरे की बीन से !
शेर है या सच की फोटोग्राफी? एक बबरशेर तबतक पालतू नहीं हुआ करता जबतक उसके हालात के चलते लाले न पड़ें. .. कंधों पर की जिम्मेदारियाँ बहुत कुछ बर्दाश्त करने को झुका डालती हैं.
घरकी चाहरदीवारियाँ संस्कार देती थीं. समाज की दशा अगर आज बिगड़ी दीखे है.. तो घरों का लगातार बंगला होते जाना भी है. -
>>>>बंगले मकान तो यहाँ लाखो ही मिलेंगे
घर ढूँढना पड़ेगा मगर दूरबीन से !

आभार, योगराजभाई.. बहुत दिल से कहा है आपने सारा कुछ. सोचता रहा था मैं .. और आज हमने अपनी कह डाली.. .

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 16, 2010 at 12:17pm
विवेक भाई, आपको ग़ज़ल पसंद आई ये जान कर बहुत अच्छा लगा !
Comment by विवेक मिश्र on September 9, 2010 at 4:58pm
/रेशम के शहर आ बसा हूँ इस यकीन से
कोई तो मिले इश्क जिसे पापलीन से !/
- एक ताज़ा ख़याल के साथ बेहद उम्दा मतला. जितनी बार पढ़ा, उतनी बार नया ही लगा.

/मैं चाँद सितारों के ज़िक्र में हूँ अनाड़ी,
इन्सान हूँ जुड़ा हुआ अपनी ज़मीन से !./
- ज़मीन से जुड़े रहकर भी, ज़मीन से 2 फुट ऊपर का शे'अर कह डाला. वाह..

/सच्चाई की तासीर तो कड़वी ही रहेगी,
आएगी न मिठास कभी भी कुनीन से !/
- एकदम सच्ची बात है..

/मजबूरी-ए-हालात है कुछ और नहीं है,
जो मस्त लगा नाग सपेरे की बीन से !/
- काश इतने तीखे ख़याल मुझे भी आ पाते.

/बंगले मकान तो यहाँ लाखो ही मिलेंगे
घर ढूँढना पड़ेगा मगर दूरबीन से !/
- ये शे'अर सबसे ज्यादा पसंद आया. बशर-ए-मौजूदा के पास सब कुछ है, पर अपने घर से आजकल सभी दूर ही हैं.

/सर को उठाऊँ ग़र तो चूल्हा रहे ठंडा,
सर को झुकाऊँ गर तो गिरता हूँ दीन से/
- क्या बात है..! आप तो छा गए गुरुदेव..

/ससुराल में बिटिया के हालात जो सुने,
कांटे जिगर में चुभ गए लाखों महीन से !./
- कडवी सच्चाई को इतने प्रभावशाली ढंग से कहना सभी को नहीं आता. ये काम तो वही कर सकता है, जिसने तजुर्बे की भट्टी में अपनी कलम पकाई हो..

कम लफ़्ज़ों में कहें तो कुछ यूँ बन पड़ेगा- "वाह उस्ताद वाह...!"

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 8, 2010 at 6:54pm
आपकी इस फराखदिली का दिल से मशकूर हूँ आजर साहिब !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय नीलेश भाई, आपका स्वागत है.     करेला हो अथवा नीम, लाख कड़वे सही, लेकिन रुधिर…"
53 minutes ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय बाग़ी जी एवं कार्यकारिणी के सभी सदस्यगण !बहुत दुखद है कि स्थिथि बंद करने तक आ गयी है. आगे…"
yesterday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
yesterday
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
Monday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
Monday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
Monday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो…"
Monday
आशीष यादव posted a blog post

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे…See More
Monday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत अच्छे दोहे रचे गए हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।"
Monday
आशीष यादव commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"एक बेहतरीन ग़ज़ल रचा है आपने। बिलकुल सामयिक।  इस बढ़िया रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service