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इशारॊं-इशारॊं सॆ
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इशारॊं-इशारॊं सॆ, बात कर ली जायॆ ॥
आज सितारॊं सॆ, बात कर ली जायॆ ॥१॥

गुलॊं सॆ मॊहब्बत, है हर एक कॊ,
क्यूं न ख़ारॊं सॆ, बात कर ली जायॆ ॥२॥

यह हवॆली महफ़ूज़, है या कि नहीं,
इन पहरॆदारॊं सॆ, बात कर ली जायॆ ॥३॥

रॊटी की कीमत, समझ मॆं आ जायॆ,
जॊ बॆरॊजगारॊं सॆ, बात कर ली जायॆ ॥४॥

उस की आबरू, नीलाम हॊगी कैसॆ,
चलॊ पत्रकारॊं सॆ, बात कर ली जायॆ ॥५॥

किसकी सिसकियां, हैं उन खॆतॊं मॆं,
"राज"जमींदारॊं सॆ, बात कर ली जायॆ ॥६॥

कवि-"राज बुन्दॆली"
२४/०१/२०१२

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Comment

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Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 25, 2012 at 2:22am

धन्यवाद,,,,,मंच कॊ एवं आप सभी कॊ प्रणाम,,,,,,,,,,,,


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 24, 2012 at 7:22pm

सभी अशआर अच्छे है , लम्बी रदीफ़ के साथ अच्छी ग़ज़ल कही है , दाद कुबूल करें |

Comment by दीपक कुमार on January 24, 2012 at 7:11pm

बात कर ली जायॆ......

bahut khoob kavi rajbundeli ji..!!

Comment by आशीष यादव on January 24, 2012 at 3:58pm

बहुत गूढ़ बात है शायरी में.

सभी शे'र ख़ास लगे.

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