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ग़ज़ल - यहाँ अनबन नहीं है ( गिरिराज भंडारी )

१२२२    १२२२     १२२२      १२२

मेरा घेरा ये बाहों का तेरा बन्धन नहीं है

इसे तू तोड़ के जाये मुझे अड़चन नहीं है

 

समय की धार ने बदला है साँपों को भी शायद

वो लिपटे हैं मेरी बाहों से जो चन्दन नहीं है

 

जिन्हों ने कामनाओं की जकड़ स्वीकार की थी   

उन्हीं की भावनाओं में बची जकड़न नहीं है

 

न लो गंभीरता से तुम बुढ़ापे की लड़ाई को

अकेलेपन को भरता  हूँ, यहाँ अनबन नहीं है

 

सभी राहों में कांटे, फूल पत्थर है नदी भी

ये दुनिया छोड़ जाने का कोई कारन नहीं है

 

अगर चलती हैं साँसें तो कभी पूछो तो खुद से

किसी की वेदना में क्यूं यहाँ क्रन्दन नहीं है

 

किसी की दृष्टि बाधित है, किसी की सोच लंगड़ी  

दिखाई साफ़ दे ऐसा कोई दरपन नहीं है

  ***************************************************** 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 27, 2025 at 4:57pm

आ. भाई गिरिराज जी, सादर अभिवादन।उत्तम गजल हुई है। हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 26, 2025 at 8:56pm

आदरणीय सौरभ भाई , ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति हमेशा प्रेरणा दाई  होती है , ग़ज़ल के कुछ शेर आपको अच्छे लगे  जान  कर संतुष्टि हुई | उत्साह वर्धन करने के लिए आपका हार्दिक आभार |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 16, 2025 at 10:48am

आदरणीय गिरिराज भाईजी, आपकी प्रस्तुति पर आने में मुझे विलम्ब हुआ है. कारण कि, मेरा निवास ही बदल रहा था. तभी अपरिहार्य कारणों से पैत्रिक गाँव जाना पड़ गया. खैर.. 

आपकी प्रस्तुति के कई शेरों पर अनायास ही वाह-वाही निकल रही है. यह अवश्य है कि मैं ’दरपन’ शब्द को लेकर मिले सुझाव से बहुत सहमत नहीं हूँ.  वस्तुतः, गजल के नाम पर हम उर्दू-फारसी-अरबी शब्दों को लेकर जितने आग्रही हो जाया करते हैं, उसी आवृति से हम हिंदी भाषा में मान्य हो चुके शब्दों और भाषा-व्याकरण के प्रति सनिष्ठ नहीं होते. अतः अपनी समझ के आधार पर अपने विचारों को दृढ कर लेते हैं. ’दर्पण’ तत्सम शब्द है, जबकि इसी शब्द का ’दरपन’ तद्भव रूप है. यदि हम तद्भव को नकारने लगे, तो दूध, काँटा, बछड़ा आदि-आदि जैसे सैकड़ों शब्दों को त्यागना पड़ जाएगा. अलबत्ता, ’कारण’ को ’कारन’ लिखा जाना उचित नहीं है. लेकिन गजल में ’न’ और ’ण’ की तुकान्तता ली जा सकती है. जैसे ’त’ और ’थ’ की तुकान्तता ले ली जाती है. 

शुभातिशुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 10, 2025 at 7:56am

आदरणीय रवि भाई  ग़ज़ल पर उपस्थिति  हो  उत्साह वर्धन  करने के लिए आपका आभार 

आदरणीय आपकी शंका निर्मूल नहीं है , सोचता हूँ कुछ और , अगर आपको सूझे तो आप भी बता सकते हैं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 10, 2025 at 7:54am

अनुज बृजेश ,  ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभार , मेरी कोशिश हिन्दी शब्दों की उपयोग करने की है  , आपकी सलाह अच्छी है , आपका आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 10, 2025 at 7:50am

आदरणीय अजय भाई ,  ग़ज़ल पर उपस्थिति हो  उत्साह वर्धन करने के लिए आपका आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 10, 2025 at 7:49am

आ. नीलेश भाई ग़ज़ल पर उपस्थिति और उत्साह वर्धन के लिए आपका आभार 

Comment by Ravi Shukla on June 9, 2025 at 12:37pm

आदरणीय गिरिराज भाई जी नमस्कार ग़ज़ल का अच्छी प्रयास है । आप को पुनः सृजन रत देखकर खुशी हो रही है 

मुझे पढ़ने में दूसरे शेर  में बाहों को देखते हुए जो चंदन नहीं है की जगह नहीं हैं समझ आ रहा है अगर यह सही है तो रदीफ बदल रही है बाहें बहुवचन है जो चंदन नहीं हैं । देखियेगा । ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिये बधाई स्वीकार करें । 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 4, 2025 at 11:45am

आदरणीय भंडारी जी बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है सादर बधाई। दूसरे शेर के ऊला को ऐसे कहें तो "समय की धार ने बदली निज़ामत विषधरों की" 

बस एक ख़्याल 

Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on May 31, 2025 at 6:17pm

ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें आदरणीय गिरिराज जी। 

नीलेश जी की बात से सहमत हूँ। उर्दू की लिपि में “न” और “ण” को अलग नहीं किया जा सकता पर देवनागरी में तो इन्हें पृथक ही रखना चाहिए। 

सादर 

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