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दोहा सप्तक -५ ( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

सूरज यूँ है गाँव में, बहुत अधिक अँधियार।
नगर-नगर ही कर रही, किरणें हर व्यापार।।१
*
बन जाती है देश  में, जिस की भी सरकार।
जूती सीधी कर रहे, नित उस की अखबार।।२
*
कैसे ये बस्ती जली, क्यों उजड़ा बाजार।
किस से पूछें बोलिए, जगी नहीं सरकार।।३
*
गमलों में  फसलें  उगा, खेतों  में हथियार।
इसी सोच से क्या सुखी, होगा यह संसार।।४
*
कोई जब हो छीनता, थोड़ा भी अधिकार।
आँखों से आँसू  नहीं, निकलें  बस अंगार।।५
*
बातें व्यर्थ सुकून की, कह लो कितनी बार।
बचपन वाला पर  नहीं, आता अब इतवार।।६
*
कौशल नदिया  सा  रखो, पर्वत  सा आचार।
चलो जिधर बाधा बने, खुद पथ का आधार।।७
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 13, 2022 at 11:02pm

आ. भाई अमीरुद्दीन जी  सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on January 13, 2022 at 5:05pm

जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, अच्छे दोहे हुए हैं हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 13, 2022 at 5:02pm

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और स्नेह के लिए हार्दिक आभार।

आपकी उपस्थिति से पूर्ण आस्वस्थि हुई। सादर..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 12, 2022 at 4:15pm

वाह !  संप्रेषण की स्तरीयता देखते ही बनती है. 

गमलों में  फसलें  उगा, खेतों  में हथियार।
इसी सोच से क्या सुखी, होगा यह संसार।।

इस दोहा के इंगित गहराई तक उतर गये आदरणीय लक्ष्मण भाईजी. 

इस रचनाकर्म के लिए हार्दिक बधाई. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 30, 2021 at 10:18pm

आ भाई समर जी सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद। 

Comment by Samar kabeer on December 30, 2021 at 3:43pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब , अच्छे दोहे रचे आपने ,बधाई स्वीकार करें I 

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