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बेबाक दिलबरी का आलम न पूँछिये। 

हम से मोहब्बत का बस हुनर सीखिये ।

दिल में लगी हो आग तो सेक लीजिये। 

वरना लगा के दाग यूँ सितम न कीजिये। 

तारीफ़ कीजिये या के इलज़ाम दीजिये। 

गोया के रह-बरी में शिरक़त तो कीजिये। 

आलम ये आशिकी का चला नजाए फ़ुज़ूल। 

दो चार मिसल दो चार मिसल हाय अल्लाह। 

एय सनम अबके साल तो छाप ही दीजिए। 

किसी के गम में ग़मख्वार होना

 कोई बुरी बात नहीं। 

लेकिन फ़नाह होकर के क्या उखाड़ लीजिये 

बेबाक दिलबरी का आलम न पूँछिये। 

हम से मोहब्बत का बस हुनर सीखिये।  

दिल में लगी हो आग तो सेक लीजिये। 

वरना लगा के दाग यूँ सितम न कीजिये। 

"मौलिक व अप्रकाशित"  । 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 31, 2021 at 4:21pm

आ. भाई अरुण जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on January 30, 2021 at 5:55pm

जनाब अरुण कुमार जी आदाब, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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