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कपड़ा-लत्ता बाँधि कै

जावैं अपने देस

कितने दिनन बिता गए

तबहुँ लगै परदेस

पहुचैं अपने द्वार-घर

लक्ष्य यही बस एक

जा खेती - बाड़ी करैं

आलस करैं न नेक

धूप - ताप मा बिन रुके

चले जाँय सब गाँव

सोचत जात , थमें नहीं

मिले जो चाहे छाँव

नदियन नाला केर सब

कचरा देब हटाय

लहर-लहर बहियैं सबै

धरती पियै अघाय

बबुआ से कहिबै चलौ

गइया लेइ खरीद

दूध, दही , मट्ठा मिलै

रोजहि मनिहै ईद 

बचै तो ओहिका बेचि कै

राशन लइ कै आब

बिना मिलावट बेचिहौं

लालच मनहुँ न लाब  

जो भी खेतन मा मिली 

नाज खाँय चाहे मोट

दिन गुजरिहैं मजे मा

भलेहु पास कम नोट

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dimple Sharma on September 2, 2020 at 3:53pm

आदरणीया ऊषा अवस्थी जी नमस्ते, गांव की महक लिए बिल्कुल गांव की भाषा में रची हुई ये रचना बहुत खुबसूरत हुई है बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

Comment by Samar kabeer on August 31, 2020 at 12:05pm

मोहतरमा उषा अवस्थी जी आदाब , अच्छी रचना हुई है , बधाई स्वीकार करें I

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"ख्याल बहुत उम्दा हैं गज़ल में। हार्दिक बधाई, भाई लक्ष्मण जी।"
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