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मज़ाक था वो मगर हमने प्यार मान लिया(८५ )

 ( 1212 1122 1212 22 /112 )

मज़ाक था वो मगर हमने प्यार मान लिया

कि ख़ुद को तीर-ए-नज़र का शिकार मान लिया

**

ग़मों को क़ल्ब का हमने क़रार मान लिया

ख़िज़ाँ के रूप में आई बहार मान लिया

**

ख़ुशी ने बारहा इतना दिया फ़रेब हमें

ख़ुशी को ज़िंदगी से अब फ़रार मान लिया

**

समझने सोचने की ताब खो चुके हैं हम

दिमाग़ में है हमारे दरार मान लिया

**

पिलाई साक़िया ने चश्म से हमें वो मय

हयात भर को चढ़ा है ख़ुमार मान लिया

**

कहा किसी ने था-"आसेब इश्क़ का हूँ मैं "

अभी तलक है वो साया सवार मान लिया

**

फ़िराक़ आज बिगाड़ेगा क्या हमारा जब

इसे ही हमने सुकूँ की फुहार मान लिया

**

विदा के वक़्त कहा यार ने मिलेंगे फिर-

"मुहब्बतों को तुम्हारी उधार मान लिया "

**

सलाम अर्ज़ है अहसानमंद भी हैं 'तुरंत '

कि आशिक़ों में हमें भी शुमार मान लिया

**

गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी |

मौलिक व अप्रकाशित

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