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सहज शान्ति भरपूर

सीख अनर्गल दे रहे , बढ़-चढ़ बारम्बार

हमको भी अधिकार है , करने का प्रतिकार

केवल जिभ्या चल रही , करें न कोई काज

नित्य करें अवमानना , सारी लज्जा त्याग

अस्थिरता फैला रहे , करते व्यर्थ प्रलाप

गिद्ध दृष्टि बस वोट पर , अन्य न कोई बात

जब है विश्व कराहता , बढ़े भयंकर रोग

केवल बस आलोचना , नहीं कोई सहयोग

शान्थि समर्थक को समझ पत्थर , रगड़ें आप

प्रकटेगी शिव रोष की अगनि , भयंकर ताप

उसमें  सारा भस्म हो , मद होगा जब चूर

निश्चित तब हो पाएगी , सहज शान्ति भरपूर

मौलिक एवं अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by Usha Awasthi on April 20, 2020 at 5:40pm

हार्दिक आभार आपका

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 20, 2020 at 2:13pm

आ. ऊषा जी, बहुत अच्छे सारगर्भित दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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